चाईबासा (CHAIBASA): झारखंड का घना सारंडा जंगल अब धीरे-धीरे नक्सल मुक्त होने होने की राह पर है. कभी उग्रवादियों का गढ़ माने जाने वाले इस इलाके में अब हालात तेजी से बदल रहे हैं. नक्सलियों को इस समय तीन बड़े मोर्चों पर एक साथ चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. इसके कारण नक्सलियों का नेटवर्क कमजोर हो रहा है और वे समाप्ति की ओर बढ़ रहे है. फिलहाल सारंडा में सिर्फ मिसिर बेसरा का ही एक दस्ता बचा है. लेकिन उसका दस्ता भी सुरक्षाबलों के निशाने पर है. मिसिर बेसरा का दस्ता पिछले 4 दिनों से सुरक्षाबलों से घिरा हुआ है. बालिबा के चडराबेड़ा जंगल में 2 दिनों तक चली मुठभेड़ के बाद फिलहाल मुठभेड़ नहीं हो रही है, लेकिन सुरक्षाबलों ने दस्ते को चारों ओर से घेर रखा है. अगर मिसिर बेसरा और उसके दस्ते में शामिल अन्य नक्सलियों का का एनकाउंटर करने में सुरक्षाबलों को सफलता मिलती है तो सारंडा पूरी तरह से नक्सल मुक्त होने का दावा किया जा रहा है.
जानिए कैसे कमजोर हो रहे नक्सली
नक्सलियों के समक्ष सबसे पहला और सबसे बड़ा दबाव सुरक्षा बलों का है. कोबरा, सीआरपीएफ, झारखंड जगुआर और जिला पुलिस की संयुक्त टीमों ने लगातार सघन ऑपरेशन चलाकर नक्सलियों के ठिकानों को ध्वस्त किया है. सुरक्षाबलों ने राधापोरा, बालिबा और बाबूडेरा जैसे इलाकों को पूरी तरह से घेरकर नक्सलियों के आवाजाही और छिपने के विकल्प सीमित कर दिए हैं. दूसरा बड़ा झटका नक्सलियों को ग्रामीणों से टूटते समर्थन के रूप में लगा है. पहले जहां स्थानीय लोग डर या प्रभाव में उनका साथ देते थे, वहीं अब विकास कार्यों और सुरक्षा बलों की बढ़ती मौजूदगी के कारण ग्रामीण उनसे दूरी बना रहे हैं. सूचना तंत्र कमजोर होने से नक्सलियों की गतिविधियां पहले जैसी प्रभावी नहीं रह गई हैं. तीसरा और निर्णायक मोर्चा है राशन की भारी कमी. लगातार ऑपरेशन और निगरानी के कारण हथियार, खाद्य सामग्री और जरूरी संसाधनों की सप्लाई बाधित हो गई है. इससे नक्सली लंबे समय तक टिके रहने की स्थिति में नहीं हैं और उनका मनोबल भी गिर रहा है.
मिसिर बेसरा के दस्ते में भी दाना-पानी पर संकट
मिसिर बेसरा के दस्ते के साथ भी ऐसा ही हो रहा है. दस्ते के पास राशन व अन्य संसाधनों की भारी कमी हो गई है. सुरक्षाबलों की घेराबंदी के कारण नक्सली जंगल से निकल नहीं पा रहे है. ऐसे में कयास ये भी लगाए जा रहे हैं मिसिर अपने दस्ते के साथ सुरक्षाबलों के समक्ष आत्मसमर्पण कर सकता है. सुरक्षाबलों के दबावों का असर साफ दिख रहा है. सारंडा में नक्सलियों की पकड़ ढीली पड़ रही है और सुरक्षा बलों की रणनीति रंग ला रही है. अगर यह अभियान जारी रहा, तो जल्द ही यह इलाका पूरी तरह नक्सल मुक्त हो सकता है.
मिसिर के साथ एक करोड़ का इनामी असीम भी दस्ते में
मिसिर बेसरा के दस्ते में उसके अलावा और भी कई नक्सली हैं जो कुख्यात और इनामी है. एक करोड़ का इनामी भाकपा माओवादी सेंट्रल कमेटी का सदस्य असीम मंडल उर्फ आकाश उर्फ तिमिर भी इस दस्ते में है. जमशेदपुर के दिवंगत सांसद सुनील महतो हत्याकांड समेत कई बड़ी नक्सली वारदातों में उसका नाम शामिल है. वह पश्चिम बंगाल के प. मिदनापुर स्थित चंद्रकोना का रहने वाला है. वहीं, मिसिर के दस्ते में पटमदा के झुझका निवासी रामप्रसाद मार्डी उर्फ सचिन भी है. सचिन भी दिवंगत सांसद सुनील महतो हत्याकांड में शामिल था. उसने सुनील महतो के अंगरक्षक का इंसास भी लूट लिया था. जो अब भी उसके पास ही है. सचिन पर सरकार ने 15 लाख का इनाम रखा है. मिसिर के दस्ते में 50 से अधिक नक्सली बताए जा रहे है.