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संताल हुल विद्रोह : संताल के इन 6 भाई-बहनों का नाम सुनते ही कांप उठते थे अंग्रेज, आखिर कौन थे ये लोग?

BY -
Samiksha Singh
Samiksha Singh
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 15, 2026, 12:21:36 PM

दुमका(DUMKA): इतिहासकारों ने भले ही 1857 के सिपाही विद्रोह को भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम करार दिया हो, लेकिन इस विद्रोह की पृष्ठभूमि तैयार करने में स्थानीय स्तर पर हुए विद्रोह को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता. उसी में एक नाम है 1855 का संताल हुल विद्रोह. जो वर्तमान में संताल परगना प्रमंडल  सहेबजंग जिला के भोगनाडीह से शुरू हुआ था. वैसे तो यह विद्रोह महाजनी प्रथा, भूमि राजश्व में बेतहाशा वृद्धि और रेल लाइन बिछाने के दौरान ब्रिटिश ठेकेदार द्वारा महिलाओं पर किए जा रहे शारीरिक शोषण के खिलाफ था, लेकिन आन्दोलनकारियों द्वारा सरकारी संपत्ति की क्षति पहुचाये जाने पर ब्रिटिश हुकूमत द्वारा प्रत्यक्ष रूप से इस विद्रोह को कुचला गया. सिदो, कान्हू, चांद, भैरव और फूलो, झानो नामक 6 भाई बहन इस विद्रोह के नायक रहे. 

 वर्तमान का संताल परगना प्रमंडल उस वक्त ग्रेटर बंगाल प्रेसीडेंसी के बीरभूमि जिला के पश्चिम भाग जंगल महल के नाम से जाना जाता था. स्वभाविक है जब आंदोलन का श्रीगणेश संताल परगना से हुआ तो यहां उस आंदोलन से जुड़ी कई यादें है, जिसे इतिहास के पन्नो पर उचित स्थान नहीं मिल पाया. आज भी जब संताल हुल विद्रोह की चर्चा होती है तो लोगों के जेहन में भोगनाडीह और सिदो कान्हू ही आता है. आज हम आपको बताने जा रहे है दुमका जिला के रानीश्वर प्रखंड के दिगुली स्थित संताल काटा पोखर का इतिहास।

 

क्या है संताल काटा पोखर का इतिहास

संताल काटा पोखर नाम सुनकर अगर आप भी यही सोच रहे है कि इस पोखर(तालाब) में संताल समुदाय के लोगों को काटा गया होगा तो बिल्कुल सही सोच रहे है. दरअसल संताल हूल विद्रोह सहेबजंग के भोगनाडीह से शुरू हुआ था और उस वक्त देश की राजधानी कोलकाता थी. लाट साहेब सर्वोच्च पदाधिकारी हुआ करते थे. संताल हूल विद्रोह का शंखनाद होते ही काफी संख्या में आंदोलनकारी परंपरागत हथियार से लैस होकर भोगनाडीह से कोलकाता के लिए रवाना हुए. निर्धारित मार्ग था रानीश्वर स्थित मयूराक्षी नदी को पार कर कोलकाता पहुँचना. जब क्रांतिकारियों के जत्था मयूराक्षी नदी के आमजोडा घाट पार कर रहे थे तो उनका सामना ब्रिटिश सैनिकों से हुई. सैनिकों की गोली से कई क्रांतिकारी शहीद हो गए. उन क्रमतिकरियों के शव को नदी से सटे दिगुली के जिस तालाब में फेंका गया उसे ही संताल काटा पोखर के नाम से जाना जाता है. अंतिम सर्वे रिकॉर्ड में उस तालाब का नाम संताल काटा पोखर है. 

गुमनामी में रहे संताल काटा पोखर को शहीद स्थल के रूप में विकसित करने का प्रयास शुरू 

संताल हूल विद्रोह के 167 वर्षो बाद सरकार और प्रसासन की नजर संताल काटा पोखर पर गयी है, जबकि इसके संरक्षण की मांग लगभग 3 दशक से स्थानीय लोग कर रहे थे. वर्ष 2022 में डीसी रविशंकर शुक्ला के प्रयास से इस ऐतिहासिक तालाब के संरक्षण और इस स्थल को शहीद के साथ पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किए जाने की कार्यवाई शुरू हो चुकी है. गत वर्ष गणतंत्र दिवस की झांकी में संताल काटा पोखर की झांकी को सीएम सहित दर्शकों ने सराहा. डीसी रविशंकर शुक्ला खुद इस ऐतिहासिक तालाब के जीर्णोद्धार की मोनेटरिंग कर रहे है. विशेष प्रमंडल द्वारा किए जा रहे इस तालाब के जीर्णोद्धार कार्य का डीसी ने बुधवार को निरीक्षण किया. कार्यपालक अभियंता को 30 दिनों के अंदर तालाब के जीर्णोद्धार, सौंदर्यीकरण, पोखर के तट पर विद्रोह से जुड़े महान योद्धाओं की प्रतिमा स्थापन के साथ संताल विद्रोह से जुड़े होडिंग लगाने का निर्देश दिया. उन्होंने कहा कि यहां आने वाले पर्यटकों के बैठने की व्यवस्था, पार्किंग, पेयजल, सुरक्षा आदि की व्यवस्था की जाएगी. 

स्थल का संरक्षण स्वागतयोग्य कदम

घटना के इतने वर्षों बाद प्रशासनिक स्तर से ऐतिहासिक संताल काटा पोखर का संरक्षण स्वागतयोग्य कदम है. स्थानीय लोग इसकी सराहना कर रहे है. होनी भी चाहिए क्योंकि अपनी विरासत को संरक्षित रखना हम सबों की सामूहिक जिम्मेदारी है. सैकड़ों वर्षों तक गुलामी का दंश झेलने के बाद हमने आजादी पायी है और ये आजादी हमें यू ही नहीं मिली, बल्कि इसके लिए हमारे पूर्वजों ने अपने प्राणों की आहुति दी है. गुलाम भारत में ना सही आजाद भारत मे शहीदों को सम्मान मिलनी ही चाहिए. 

रिपोर्ट: पंचम झा 

Tags:Santal Hul Daydumkasantal pargnaHul Day 2023

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