धनबाद(DHANBAD): शनिवार आधी रात के बाद से धनबाद के चर्चित "सिंह मेन्शन" का नजारा बदला -बदला सा दिख रहा है. आखिर ऐसा हो भी क्यों नहीं ,संजीव सिंह मेयर चुन लिए गए है. " होनहार बिरवान के होत चिकने पात" का यह मुहावरा धनबाद में पूर्व विधायक संजीव सिंह पर पूरी तरह से फिट बैठ रहा है, साहस और धैर्य के साथ झंझावातो का सामना करते हुए वह राजनीति के एक बार फिर शिखर पर पहुंच गए हैं. 8 साल से अधिक समय तक जेल में रहने के बाद निकले तो गाजे -बाजे के साथ उन्हें मेयर की कुर्सी मिल गई. यह अलग बात है कि लगातार लंबे समय तक जेल में रहने की वजह से "सिंह मेंशन" कमजोर दिखने लगा था,
जेल से बाहर निकले तो धनबाद की राजनीति पर छा गए.
लेकिन जब जेल से बाहर निकले तो धनबाद की राजनीति पर छा गए. पिता की विरासत को आगे बढ़ाने का संघर्ष उनका अभी खत्म नहीं हुआ है. यह अलग बात है कि समय-समय पर 'वक्त" ने उनकी कड़ी परीक्षा ली. लेकिन वह जनता के भरोसे और विश्वास के साथ आगे बढ़ते रहे. जेल में रहने के बावजूद भी समर्थकों की फौज बनी रही. उनके जेल में रहते ही उनकी पत्नी रागिनी सिंह झरिया से विधायक चुनी गई. यह अलग बात है कि समय के साथ सिंह मेंशन कई खेमे में बट गया, बावजूद संजीव सिंह की विजय यात्रा एक बार फिर शुरू हो गई है. यह भी सच है कि संजीव सिंह के लम्बे समय तक जेल में रहने के समय विधायक रागनि सिंह समर्थको को एकजुट रखने में पूरी तरह से सफल रही.
सिंह मेन्शन की राजनीतिक यात्रा में रागनि सिंह की भी बड़ी भूमिका ---
बता दे कि झंझावातों से लड़कर "सिंह मेंशन" एक बार फिर शिखर पर पहुंच गया है. हालांकि यह कोई पहला मौका नहीं है, इसके पहले भी कई बार सिंह मेंशन को परेशानियों ने घेरा. लेकिन धैर्य और साहस से उन परेशानियों से सिंह मेंशन उबरता रहा है. कहा जा सकता है कि सिंह मेंशन का ऐसा इतिहास बन गया है. 8 साल से अधिक समय तक जेल जीवन बिताने वाले झरिया के पूर्व भाजपा विधायक संजीव सिंह जब जेल से बाहर निकले, तो लगता है, मेयर की कुर्सी उनका इंतजार कर रही थी और वह अब धनबाद के पहले नागरिक बन गए हैं. यह अलग बात है कि भाजपा से बागी बनकर जब वह मैदान में उतरे ,तो भी उन्हें बहुत कुछ सहना और देखना पड़ा. फिर भी अपने निर्णय पर अडिग रहे. समर्थकों का दबाव उन पर था. पत्नी भाजपा से विधायक हैं. ऐसे में कई सवाल उठाए गए. पत्नी रागिनी सिंह चुनाव प्रचार से बिल्कुल दूर रही, लेकिन इन सबसे बेखबर संजीव सिंह और उनके समर्थक चुनाव प्रचार में डटे रहे.
भाजपा नेताओं ने भरमन की जहरीली बातें ,क्या हुआ असर --
भाजपा नेताओं ने जहरीली बातें कही, फिर भी कोई असर नहीं हुआ. वैसे सरल स्वभाव के संजीव सिंह बहुत जल्दी किन्हीं बातों पर प्रतिक्रिया नहीं देते हैं. इस चुनाव में भी उन्होंने कुछ ऐसा ही किया .नतीजा हुआ कि धनबाद की जनता ने उन्हें हाथों-हाथ ले लिया. यह जीत कोई साधारण जीत नहीं है, क्योंकि पहली बार नगर निगम के चुनाव में किसी प्रत्याशी को एक लाख से अधिक मत मिले हैं. संजीव सिंह की यह जीत केवल एक विजय नहीं है, बल्कि यह जीत अपनी आंचल में कई राजनीतिक संदेशों को छुपाए हुए हैं. समय के साथ राजनीतिक संदेश दिखेंगे. झरिया से अपने विधायक कार्यकाल के दौरान लगभग आधे समय तक वह जेल में रहे. उसके बाद हुए चुनाव में उनकी पत्नी भाजपा से उम्मीदवार बनी. लेकिन चुनाव हार गई. यह समय 2019 का था. फिर 2024 का समय आया. समय ने पलटा खाया और संजीव सिंह की पत्नी रागिनी सिंह झरिया से विधायक बन गई.
संजीव सिंह का बनवास हुआ खत्म ,अब आगे क्या ----
कहा जा सकता है कि इस जीत के साथ ही संजीव सिंह का बनवास खत्म हो गया है. कोयलांचल की राजनीति में उनकी दमदार वापसी हुई है. यह वापसी यह संकेत दे रही है कि धनबाद के 6 विधानसभा क्षेत्र में से 5 में संजीव सिंह की पहुंच बढ़ेगी. धनबाद, झरिया विधानसभा तो पूरी तरह से निगम क्षेत्र में है. सिंदरी विधानसभा क्षेत्र के चार वार्ड, बाघमारा विधानसभा क्षेत्र के आठ वार्ड नगर निगम क्षेत्र में पड़ता है. टुंडी विधानसभा क्षेत्र का एक वार्ड भी धनबाद नगर निगम क्षेत्र में पड़ता है. इस हिसाब से अगर देखा जाए तो धनबाद के पांच विधानसभा क्षेत्र में अब संजीव सिंह का सीधा प्रभाव दिखेगा .
रिपोर्ट -धनबाद ब्यूरो
