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साहिबगंज:राजकीय माघी पूर्णिमा मेला में उमड़ी लाखों श्रद्धालुओं की भीड़,श्रद्धालुओं ने लगाई आस्था की डुबकी

BY -
Priyanka Kumari CE
Priyanka Kumari CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 13, 2026, 9:41:43 AM

साहिबगंज(SAHIBGANJ):आदिवासीयों का महाकुंभ यानी राजमहल में आयोजित राजकीय माघी पूर्णिमा मे आज सुबह से ही श्रद्धालुओं का जत्था गंगा स्नान एवं पूजन के लिए गंगा तट पहुंचा.ला खों की संख्या में आदिवासी औरगैर-आदिवासी श्रद्धालुओं ने आस्था की डुबकी लगाई.माघ मास की पूर्णिमा पर झारखंड के एकमात्र राजमहल के उत्तरवाहिनी गंगा तट पर लगने वाला माघी मेला कई मायनों में खास है. यह मेला आदिवासी एवं गैर आदिवासी समाज के सांझी संस्कृति का एक अद्भुत मिसाल पेश करता है.

साफाहोड़ आदिवासी गुरु शिष्य की परंपरा का अनोखा उदाहरण है

 झारखंड का आ दिवासी महाकुंभ ऐसी आराधना करते हैं साफाहोड़ आदिवासी गुरु शिष्य की परंपरा का अनोखा उदाहरण है.ये मां गंगा को जीवित जीव दान करते हैं साफाहोड़ आदिवासी गंगा के प्रति है सच्ची श्रद्धा रखते है और शैंपू साबुन या तेल काइस्तेमाल नहीं करते.मांझी थान में चार और जाहेर थान में पांच देवताओं को पूजते है.झारखंड का आदिवासी महाकुंभ गंगा तट पर आदिवासियों का जुटान इतने बड़े संख्या में राजमहल में ही होता है.इसलिए इसे आदिवासियों का महाकुंभ भी कहा जाता है.जिला प्रशासन की ओर से भी प्रचार प्रसार बैनर में राजकीय माघी पूर्णिमा मेला (झारखंड आदिवासी महाकुंभ) अंकित है.यहां विदिन समाज एवं साफाहोड़ आदिवासी समाज के श्रद्धालु अपने-अपने धर्मगुरुओं के साथ अनुशासनिक तरीके से अपने अखाड़ा से निकलकर गंगा स्नान व गंगा पूजन एवं घंटों सूर्योपासना के उपरांत लोटा में जल लेकर भीगे वस्त्र में ही अखाड़ा पहुंचते हैं. जहां ईष्ट देवता और अन्य देवी देवताओं की आराधना की जाती है.

गुरु बाबा शिष्यों के कष्टों का निवारण विशिष्ट शैली से करते हैं 

 गुरु बाबा अखाड़ा में अपने शिष्यों के शारीरिक,आर्थिक व मानसिक कष्टों का निवारण विशिष्ट आध्यात्मिक शैली से करते हैं. मान्यता है कि माघी पूर्णिमा में गंगा स्नान से पापों से मुक्ति मिलती है. आधुनिक चकाचौंध से दूर साफाहोड़ एवं विदिन समाज के अनुयायी मांस मदिरा का सेवन करना तो दूर, लहसुन प्याज तक नहीं खाते हैं. वे विशुद्ध सादा भोजन सादगी पूर्वक जीवन व्यतीत करते हैं.

पढे आदिवासी के धर्म गुरु बाबा ने क्या कहा

आदिवासियों के धर्मगु रु बुद्धू मुर्मू एवं राम बाबा ने बताया कि सफा होड़ आदिवासी समाज के लोग बलि प्रथा नहीं मानते हैं.मन्नतें पूरी होने पर माघ मास की पूर्णि मा पर अपने-अपने गुरु बाबा के साथ स्नान कर ने के उपरांत श्रद्धालु मां गंगा को जीवित जीव (जैसे- बकरा या कबूतर) का दान करते हैं.भारी संख्या में बकरे व कबूतर का दान किया जाता है.गंगा के प्रति है सच्ची श्रद्धा, शैंपू साबुन या तेल का नहीं करते इस्तेमाल सरकार एवं प्रशासन द्वारा गंगा नदी को स्वच्छ रखने के लिए जाग रुकता के नाम पर लाखों रुपए खर्च किया जाता है, नमामि गंगे जैसी योजनाओं का संचालन भी किया जाता है, लेकिन अच्छी बात यह है कि आदिवासी समाज स्वत: ही इस मामले में जागरुक हैं. मां गंगा के प्रति उनकी सच्ची श्रद्धा ही है कि यह लोग गंगा स्नान में शैंपू साबुन या तेल का उपयोग नहीं करते हैं.

साफाहोड़ आदिवासियों के द्वारा भी छोटे बड़े अखाड़ा बनाए गए हैं

इधर साफाहोड़ आदिवासियों के द्वारा भी छोटे बड़े अखाड़ा बनाए गए हैं.अपने-अपने धर्म गुरुओं के साथ गंगा स्नान एवं गंगा पूजन किए हैं. भीगे वस्त्र पहले लोटा में जल लेकर बेंत की लकड़ी से गुरु अपने शिष्यों के कष्ट का निवार ण कर रहे हैं. साफाहोड़ के अखाड़ा में मां गंगा की प्रतिमा भी स्थापित की गई है. मां गंगा के समक्ष धाम लगाकर पूजा अर्चना की जाएगी.

रिपोर्ट गोविंद ठाकुर

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