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मुख्यमंत्री के वादों के बावजूद झारखंड के आदिवासी-मूलवासी वन अधिकार से वंचित- जनाधिकार महासभा

BY -
Shahroz Quamar
Shahroz Quamar
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 13, 2026, 1:45:38 AM

रांची (RANCHI): जंगल के आसपास रहने वालों की जीविका का आधार ही वन है. इसलिए उन्हें सरकार ने कई अधिकार भी दिये. इसके लिए 2018 में कानून भी बना. जिसके तेहत ऐसे लोगों को वन अधिकार का पट्टा भी देना था, लेकिन धरातल पर तस्वीर कुछ और ही कहती है. उन्हें पट्टा तो मिला नहीं, उल्टा वन विभाग की ओर से आदिवासी और मूल वासियों को प्रताड़ित किया जाता है. ऐसी ही बातें आज झारखंड जनाधिकार महासभा के प्रतिनिधियों ने रांची में मीडिया से साझा कीं. वहीं एक रिपोर्ट के बारे में बताया, जो फैक्ट फाइंडिग टीम ने उजागर की है.

सत्यभारती में हुई प्रेस मीट में रांची की एलिना होरो, लातेहार के जॉर्ज मोनिपल्लि, प्रवेश राणा, कुंदन भुइयां और खूंटी के फिलिप बाड़ा रांची की इलीना होरो ने कहा कि सत्तारूढ़ी दल झामुमो और कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्रों में वन अधिकार कानून को सही से लागू करने एवं जंगल में रहने वाले आदिवासी-मूलवासियों को वन पट्टा देने का वादा किया था. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सरकार बनने से पहले और उसके बाद भी कई बार इस विषय में घोषणा कर चुके हैं. लेकिन ज़मीनी स्थिति इन वादों और दावों के विपरीत है.

क्या है कानून

अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 अंतर्गत वन आश्रित समुदायों के कई अधिकार हैं. उनमें से एक यह है कि 13.12.2005 के पहले से वन भूमि पर खेती करते रहे आजीविका के लिए वनों पर निर्भर लोग उस जमीन (अधिकतम 4 हेक्टेयर) पर मालिकाना अधिकार के लिए पात्र होंगे. वन अधिकार क़ानून के धारा 4(5) में स्पष्ट उल्लेख है कि “जैसा अन्यथा उपबंधित हें, उसके सिवाय किसी वन में रहनेवाली अनुसूचित जनजाति या अन्य परंपरागत वन निवासियो का कोई सदस्य उसके अधिभोगाधीन वन भूमि से तब तक बेदखल नहीं किया जायेगा या हटाया जायेगा जब तक की मान्यता और सत्यापन प्रक्रिया पूरी नहीं होती है”. यह स्पष्ट है कि वन विभाग खुले आम कानून का उल्लंघन कर रहा है. कहा गया है कि 2008 में जब से यह कानून लागू हुआ, वन विभाग लोगों को उनके अधिकार से वंचित करने की कोशिश करता रहा है.

2015 से आवेदन लंबित, नहीं मिला पट्टा

लातेहार ज़िला के बरियातू प्रखंड के गडगोमा गाँव के 25 लोगों ने पट्टा के लिए अनुमंडल स्तरीय वन अधिकार समिति को आवेदन दिया था. यह 2015 की बात है. लेकिन आज तक न व्यक्तिगत पट्टा मिला और न ही सामुदायिक.

 

आवाज उठाने पर युवाओं को भेज दिया जेल

7 दिसम्बर 2021 को वन विभाग के कर्मी पट्टे के लिए आवेदन की हुई ज़मीन पर वन रोपण करने पहुंच गए. धमकी दी गई कि केस दर्ज कर जेल भेज देंगे. 2022 में वन विभाग की ओर से ज़मीन को कोड़ना शुरू कर दिया गया. 11 फ़रवरी 2022 को गाँव की महिलाएं ने कुछ गड्ढों में मिट्टी भर दी. उसी दिन शाम को वन विभाग के अधिकारियों ने पुलिस बल के साथ आकर गाँव के दो युवा पुरुषों – दिनेश राणा, पिता-प्रवेश राणा और रंजन राणा, पिता-अमेरिका राणा को पकड़ लिया. जब उन्हें थाना से अनुरोध कर छुड़ाने के लिए ग्रामीण पुलिस पिक्केट बरियातू पहुंचे, तो सरकारी काम में बाधा डालने के आरोप में दोनों युवा व उनके पिताओं पर मामला दर्ज कर दिया गया. युवाओं को जेल भेज दिया गया.

40 लोग 2018 से कर रहे पट्टे का इंतजार

मनिका प्रखंड के बेयांग गाँव की भी है. 40 अन्य परंपरागत वन अधिकार दावेदारों ने 2018 में व्यक्तिगत पट्टे के लिए और सामुदायिक अधिकार के लिए 2021 में दावा जमा किया था. लेकिन अभी तक उन्हें वन पट्टा नहीं मिला. दिसम्बर 2021 में विभाग ने ज़मीनों पर रोपण की तैयारी शुरू कर दी. 4 जनवरी 2022 को ग्रामीणों ने वन प्रमंडल पदाधिकारी (सामाजिक वानिकी,) लातेहार को लिखित शिकायत की कि बिना ग्राम सभा की अनुमति के वन रोपण किया जा रहा है. कोई सुनवाई नहीं होने पर ग्रामीण दो बार DFO के पास जा कर अनुरोध किए. आश्वासन तो मिला लेकिन गाँव में काम चलते रहा. 

और भी हैं कई मामले

झारखंड जनाधिकार महासभा की ओर से कहा गया है कि ऐसे मामले लातेहार ज़िला के बालुमाथ प्रखंड के शांति गांव, गुमला के कोयनजारा व चटकपुर, गढ़वा के रमना प्रखंड के बनखेता व सपाही, धुरकी प्रखंड के बिशुनिया, भंडरिया प्रखंड के रामर, महुगाई आदि में भी है. ये केवल चंद उदहारण मात्र हैं जो राज्य में वन अधिकार कानून एवं वनों पर निर्भर आदिवासी-मूलवासियों की स्थिति को दर्शाता है. राज्य में लाखों व्यक्तिगत वन अधिकार दावे एवं हजारों एकड़ के सामुदायिक दावें लंबित हैं. मुख्यमंत्री के वादे और प्रशासन-वन विभाग की कार्यवाई  के बीच एक बड़ी खाई दिख रही है.

ये की गई है मांग

-आदिवासी-मूलवासियों की कब्ज़े वाले वन भूमि पर वन रोपण के नाम पर लोगों को बेदखल करना बंद किया जाए

-लंबित वन अधिकार दावों को अविलम्ब निपटाया जाए और वन अधिकार पत्र निर्गत किए जाए

-निर्दोष लोगों पर वन विभाग द्वारा दर्ज सभी केस वापस लिया जाए. आदिवासी-मूलवासियों के वन अधिकारों व मानवाधिकार के उल्लंघन के ज़िम्मेवार वन विभाग के दोषी अधिकारियों के विरुद्ध कानूनी करवाई की जाए.

-वन अधिकारों को निहित करने की प्रक्रिया में वन विभाग के अधिकारियों के गैरकानूनी दखलन्दाज को बंद किया जाए.

 

 

 

 

 

Tags:News

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