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बाबूलाल मरांडी से लेकर हेमंत तक जारी रही 1932 की राजनीति, अब कौन सा पासा फेंक भाजपा को चित करेंगें हेमंत?

BY -
Shreya Gupta
Shreya Gupta
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 13, 2026, 8:44:16 PM

रांची (RANCHI) : आज मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन जिस 1932 के खतियान को झारखंड की अस्मिता और झारखंडियों की पहचान बता कर खाक छान रहें हैं, खतियान जोहार यात्रा के माध्यम से आदिवासी-मूलवासियों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि झामुमो हर कदम पर उनके साथ खड़ी है. इसकी जमीन वर्ष 2002 में राज्य के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के द्वारा ही तैयार की गयी थी. यह बाबूलाल मरांडी ही थें, जिनके द्वारा पहली बार झारखंड में डोमिसाइल राजनीति की शुरुआत की गयी थी और 1932 के खतियान को इसका कट ऑफ डेट माना गया था, डोमिसाइल लागू करते ही झारखंड की राजनीति में बड़ा तूफान मचा था. राज्य भर में आदिवासी-मूलवासी और दूसरे समूहों के बीच तनाव की स्थिति निर्मित हो गयी थी, कई जगहों पर हिंसा भी हुई और करीबन छह लोग इस हिंसा की भेंट चढ़ गयें. 

रघुवर दास ने 1985 को कट ऑफ डेट माना 

डोमिसाइल हिंसा के बाद बाबूलाल की सरकार भी चली गयी और इस प्रकार 1932 का खतियान पर आधारित डोमिसाइल नीति की मांग ठंडे बस्ते में जाता प्रतीत हुआ. हालांकि बीच-बीच में झामुमो के द्वारा हर चुनाव में 1932 के खतियान पर आधारित डोमिसाइल नीति की मांग की जाती रही.

रघुवर दास ने 1985 की बात कर बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की

 1932 के खतियान पर आधारित डोमिसाइल नीति की मांग तेज होता देख कर वर्ष 2014 में भाजपा की सरकार में सीएम बने रघुवर दास ने बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की, उनके द्वारा इसका कट ऑफ डेट का निर्धारण 1932 नहीं कर 1985 किया गया.

 झामुमो ने इसे आदिवासी-मूलवासी बताकर आदिवासी मूलवासियों के बीच अपनी पैठ को गहरा किया

रघुवर सरकार के द्वारा 1985 के आधार पर डोमिसाइल नीति का निर्धारण किये जाने के बाद झामुमो के द्वारा 1932 को लेकर राजनीति तेज हो गयी, गुरुजी ने भी साफ कर दिया कि हम किसी भी कीमत पर 1932 के नीचे मानने वाले नहीं है. और यह की रघुवर सरकार की यह कोशिश आदिवासी मूलवासी विरोधी है. 
2019 में रघुवर दास को करना पड़ा हार का सामना, और सामने आयी हेमंत की सरकार  वर्ष 2019 में रघुवर दास की सरकार चली गयी, जिस रघुवर दास की कोशिश गैर झारखंडी समूहों को अपने साथ लाने की थी, आदिवासी मूलवासियों से आगे जाकर भाजपा के लिए एक जमीन तैयार करने की थी, वह जमशेदपुर से अपना विधान सभा की सीट भी नहीं बचा सकें. उन्हे मुख्यमंत्री रहते हार का सामना करना पड़ा. 

हेमंत के आते ही एक बार फिर से शुरु हुई 1932 के खतियान पर आधारित डोमिसाइल की मांग 

हालांकि सीएम हेमंत की कोशिश इस विवादास्पद कानून से बचने की थी, लेकिन झामुमो का एक बड़ा हिस्सा इसके पक्ष में खड़ा था, खुद गुरु जी भी इसके साथ खड़े थें, इधर भाजपा खनन घोटाले और भ्रष्ट्राचार के दूसरे मामले में हेमंत सरकार को लगातार घेर रही थी, केन्द्रीय एजेंसियों का दवाब बढ़ता जा रहा था, इडी से लेकर सीबीआई की गतिविधियां तेज थी, लगता था कि अब हेमंत सरकार जाने ही वाली है, लेकिन साथ ही पूरे राज्य में आदिवासी-मूलवासी संगठनों के द्वारा 1932 का खतियान को लेकर रैलियां निकाली जा रही थी, हेमंत सरकार पर आदिवासी मूलवासी विरोधी होने का आरोप लगाया जा रहा था.

हेमंत सोरेन ने खेला बड़ा दाव, 1932 का खतियान, ओबीसी आरक्षण के सहारे सरकार बचाने की कवायद

झारखंड विधानसभा में एकदिवसीय विशेष सत्र में आरक्षण और 1932 आधारित स्थानीय नीति विधेयक को पास करवा लिया गया, विधायी कार्यवाही के इतिहास में यह भी एक नया रिकार्ड है. पिछले 23 सालों के इतिहास में यह पहली बार था, जब दो नियमित सत्रों मॉनसून सत्र और शीतकालीन सत्र की अंतराल अवधि में दो बार विशेष सत्र बुलाया गया, लेकिन अब इस विधेयक को राज्यपाल ने वापस कर दिया है, देखना होगा कि हेमंत सोरेन की इस पर अगली राजनीति क्या होती है.

रिपोर्ट: देवेंद्र कुमार 

Tags:Politics of 1932 continued from Babulal Marandi to Hemantjharkhand politicshemant sorenbabulal marandithe news post

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