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4 फरवरी को "झारखंड" धनबाद में होगा ,गुरु जी के निधन के बाद लगभग "फ्री हैंड" से बने सीएम का होगा पहला कार्यक्रम!

BY -
Satya Bhushan Singh   Dhanbad
Satya Bhushan Singh Dhanbad
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 24, 2026, 4:23:00 PM

धनबाद(DHANBAD): 4 फरवरी को "झारखंड" धनबाद में रहेगा।   झामुमो  अपना जन्म दिवस मनाएगा, उसी जगह पर यह जश्न मनेगा , जिस जगह पर पार्टी का गठन हुआ था.  यह  अलग बात है कि पार्टी के गठन करने वाले तीनों कद्दावर  नेता अब दिवंगत हो गए है.  विनोद बाबू, एके  राय और शिबू सोरेन।  तीनों अब इस दुनिया में नहीं हैं. शिबू सोरेन की विरासत  को संभाल रहे  हैं  हेमंत सोरेन, लगातार दूसरी बार लगभग "फ्री हैंड" से मुख्यमंत्री बने हैं.  ऐसे में झामुमो  की ताकत भी बढ़ी है तो इसे दिखाने की भी कोशिश हो रही है.  कोशिश होनी भी चाहिए, 4 फरवरी के कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए भारी -भरकम टीम बनाई गई है.  जिला समिति तो है ही, लेकिन असली दारोमदार  टुंडी के विधायक और पूर्व मंत्री मथुरा महतो पर होगी। 

टुंडी विधायक मथुरा महतो पर होगी बड़ी जिम्मेवारी 
 
इस बार के कार्यक्रम को ऐतिहासिक बनाने की कोशिश चल रही है.  इसी के बहाने शिबू सोरेन का धनबाद से लेकर दुमका तक के सफर  की भी चर्चा हो रही है.  दुमका में 2 फरवरी को पार्टी का स्थापना दिवस मनता है और धनबाद में 4 फरवरी को.  धनबाद से ही शिबू सोरेन दुमका शिफ्ट हुए और फिर दुमका के होकर रह गए. शिबू सोरेन अलग झारखंड राज्य की लड़ाई टुंडी के जंगलों से शुरू की थी.  टुंडी के मनियाडीह  में शिबू आश्रम आज भी इस आंदोलन का गवाह है.  वह अपने आंदोलन में साथियों के साथ यहां बैठक करते थे.  टुंडी से शुरू हुई अलग झारखंड राज्य की लड़ाई अभिवाजित  बिहार के समय पूरे संथाल -कोल्हान  क्षेत्र में फैल गई थी.  80 के दशक के बाद झामुमो ने संसदीय व्यवस्था में भी अपनी पकड़ बनानी शुरू कर दी.  एकीकृत बिहार में झामुमो ने अपनी राजनीतिक धमक शिबू सोरेन के नेतृत्व में बनाए रखी.   

15 नवंबर 2000 को अलग राज्य के तौर पर मिली सफलता 

लंबी लड़ाई के बाद 15 नवंबर 2000 को अलग झारखंड राज्य की स्थापना हुई.   2024 में   गठबंधन  को  प्रचंड बहुमत मिला ही, झारखंड मुक्ति मोर्चा भी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई.  यह  अलग बात है कि 2024 के पहले इतनी बड़ी संख्या में झारखंड मुक्ति मोर्चा को सीट नहीं आई थी.   शिबू सोरेन कोई व्यक्ति नहीं ,बल्कि एक विचार थे.  उनके विचार आगे  भी नई पौध को प्रेरणा देती रहेगी.  उन्होंने एक ऐसी नई पौध तैयार कर दी है, जो अब पीछे मुड़कर नहीं देखेगी.  शिबू सोरेन का जीवन कोई आसान नहीं था.  पिता की हत्या के बाद इतनी विचलित हुए कि  जमींदारों के जुल्म के खिलाफ ही लड़ाई छेड़ दी.  पूरा जीवन लड़ते रहे और अपनी हर जनसभा में लोगों से दारु- शराब से दूर रहने और पढ़ाई की ओर ध्यान लगाने की अपील करते रहे. अगर शिबू सोरेन के जीवन का अवलोकन किया जाए, तो कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन अपनी  सोच और विचार से नहीं डिगे.  1972 में ही एके  राय, विनोद बाबू के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा का धनबाद में गठन किया. 

एक ऐसा नेता-- जो 55 साल पहले ही कर लिया था अलग राज्य की कल्पना 

 मतलब आज से 55  साल पहले ही उन्होंने अलग राज्य की कल्पना कर ली  थी.  यह अलग बात है कि समय के साथ सबकी राह अलग हो गई लेकिन शिबू सोरेन ने जिस लकीर को पकड़ा, उस पर अंत -अंत तक चलते रहे.  उनका सपना 2000 में पूरा हुआ, जब झारखंड बिहार से अलग हो गया.  शिबू सोरेन की अगुवाई में कई बड़े आंदोलन हुए, तब जाकर वर्ष 2000 में अलग राज्य का सपना पूरा हुआ.  उनका सफर सिर्फ आंदोलन तक ही सीमित नहीं रहा, वह केंद्रीय कोयला मंत्री भी बने थे.  तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री भी रहे.  लेकिन इसके साथ यह भी सच है कि उनका संघर्ष उनके साथ बना रहा.  1994 में शिबू सोरेन को जेल भी जाना पड़ा, हालांकि बाद में वह जिस मामले में जेल गए थे, उसमें बरी  हो गए.  शिबू सोरेन ने सिर्फ एक आंदोलन ही नहीं खड़ा किया, बल्कि एक मजबूत नई पौध भी तैयार कर दी.  उनके पुत्र हेमंत सोरेन आज झारखंड के मुख्यमंत्री हैं और वह भी पिता के रास्ते चलने की कोशिश कर रहे है.  

दिशोम  गुरु शिबू सोरेन को आगे भी लोग क्यों सलाम करते रहेंगे 

आज जब शिबू सोरेन हमारे बीच नहीं है, झारखंड की मिट्टी, आदिवासी समाज और हर वह इंसान जो हक और सम्मान के लिए लड़ता है.  दिशोम  गुरु शिबू सोरेन को सलाम कर रहा है और आगे भी करता रहेगा।   शिबू सोरेन जरूर आज नहीं है, लेकिन उनकी सोच, उनका संघर्ष आने वाली पीढ़ियों  को रास्ता दिखाता रहेगा.  महाजनों के खिलाफ उनकी लड़ाई को आज भी याद किया जाता  है और आगे भी याद किया जाता रहेगा.  पिता की हत्या के बाद जब वह पढ़ाई छोड़कर महाजनों के खिलाफ बिगुल फूंका ,   धान कटनी आंदोलन शुरू किया ,जिसमें वह और उनके साथी  जबरन महाजनों की धान काटकर ले जाते थे.  लोग बताते हैं कि उस समय जिस खेत में धान काटना होता था, उसके चारों ओर आदिवासी युवा तीर धनुष लेकर खड़े हो जाते थे. धीरे-धीरे शिबू सोरेन का प्रभाव बढ़ने लगा.  आदिवासी समाज को उनका नेता  मिल गया था. 

रिपोर्ट -धनबाद ब्यूरो  

 

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