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इलाज के अभाव में दम तोड़ देने वाले चुंबरु बिरहोर के परिवार का पुनर्वास अटका, नोआमुंडी बीडीओ ने टाटीबा का मानने से किया इंकार

इलाज के अभाव में दम तोड़ देने वाले चुंबरु बिरहोर के परिवार का पुनर्वास अटका, नोआमुंडी बीडीओ ने टाटीबा का मानने से किया इंकार

चाईबासा (CHAIBASA): रोजगार की खोज में भटक रहा चुंबरु बिरहोर की 4 जुलाई को इलाज के अभाव में मौत हो गई थी. करीब 2 महीने से वह गहरे घाव से जूझ रहा था, बेहतर इलाज के अभाव में पैर सड़ गया था. कुछ दिनों पहले वह रोजगार की तलाश में टाटीबा से जायरपी जगन्नाथपुर पहुंचा था. पहुंचने के बाद उसकी तबीयत ज्यादा खराब हो गई. आंदोलनकारी कृष्ण चंद्र सिंकू के सहयोग से उसे सदर अस्पताल के जिरियाट्रिक वार्ड में एडमिट कराया गया था, जहां उसे ब्लड की जरूरत थी. मगर चुंबरु को कोई बल्ड देने वाला नहीं मिला था. लेकिन उसने अस्पताल में दम तोड़ दिया तो प्रशासन की आंख खुली थी, The News Post ने इस संबंध में लगातार खबरें चलाई हैं. पाठक इस और इस लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं. तब परिवार के पुनर्वास की बात कही गई थी. लेकिन यहां भी अड़चन आ गई है. इसके कारण बने हैं नोआमुंडी प्रखंड विकास पदाधिकारी. उन्होंने कह दिया है कि वो टाटीबा का निवासी ही नहीं था.

जबकि मृतक चुंबरु बिरहोर उसकी पत्नी पानी बिरहोर, बड़े पुत्र अमर बिरहोर के आधार कार्ड में नोआमुंडी के टाटीबा का पता अंकित है. वहीं चमरू बिरहोर और पानी बिरहोर का वोटर आईडी भी टाटीबा का बना है. दंपति का वोटर आईडी में मकान क्रम संख्या 129 और वोटर आईडी जारी करने की तिथि 6 जनवरी 2014 अंकित है. बिरहोर का आधार कार्ड 14 नवंबर 2013 को बना है. इससे यह साफ हो गया कि बिरहोर परिवार टाटीबा का ही निवासी है.

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पत्नी ने बताया...

पानी बिरहोर ने बताया कि चुंबरु ने जब उसे शादी कर टाटीबा लाया तो टाटीबा में पांच की संख्या में पत्तों से बनी झोपड़ी थी. पहला बच्चा जन्म के कुछ दिन बाद ही मर गया. जिसको उन्होंने टाटीबा में ही दफनाया है. कुछ साल के बाद सरकार ने उन लोगों के लिए पक्की आवास की सुविधा दी. पति बक्सा बनाने का काम करता था. उनका राशन कार्ड भी था. उन्हें प्रत्येक महीना राशन मिलता था. लेकिन टाटीबा के ही तीन बिरहोर ने साजिश के तहत उनके परिवार को पांच छह साल पूर्व टाटीबा से विस्थापित कर दिया. सर्वे में उनके परिवार को मृत घोषित करते हुए उनके सरकारी आवास पर कब्जा जमा लिया गया. चुंबरु का परिवार करीब तीन-चार साल तक इधर-उधर भटकता रहा. पिछले दो ढाई साल पूर्व उसका परिवार हाटगम्हरिया के जयरपी के पास झोपड़ी बनाकर अपना गुजर-बसर करता था. लेकिन अब उसके पति की मौत के बाद उसके और उनके दो छोटे-छोटे बच्चों का भविष्य अधर में लटक गया.

विलुप्त हो रही आदिम जनजाति बिरहोर

बता दें कि झारखंड में आदिम जनजाति बिरहोर की जनसंख्या 10 हजार के लगभग शेष रह गई है. सरकार इस वर्ग के विकास के हर साल फंड जारी करती है, लेकिन प्रशासकीय लापरवाही के नतीजे में उसका लाभ वंचित समाज तक नहीं पहुंच पाता है. इसकी ताजा मिसाल नोआमुंडी के बीडीओ हैं.  

रिपोर्ट: संतोष वर्मा, चाईबासा

Published at:07 Jul 2022 03:11 PM (IST)
Tags:News
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