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पूरे देश में नक्सल का सफाया लेकिन झारखंड में फेल हुआ मिशन, आज भी नक्सलियों के कब्जे में सारंडा, जानिए अंदर की कहानी

BY -
Samir Hussain
Samir Hussain
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: May 5, 2026, 11:14:07 AM

रांची (RANCHI): देश में 31 मार्च 2026 को नक्सलवाद के खात्मे का ऐलान गृह मंत्री अमित शाह ने किया था. इस घोषणा के बाद दावा किया गया कि देश के अधिकांश हिस्से नक्सल मुक्त हो चुके हैं. हालांकि, झारखंड का सारंडा क्षेत्र अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है. ऐसे में सवाल उठता है कि जहां अन्य राज्यों में इस अभियान को सफलता मिली, वहीं सारंडा में यह मिशन क्यों पूरी तरह सफल नहीं हो सका. इसके पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं, जिनमें भौगोलिक स्थिति, नीतिगत खामियां और सुरक्षा रणनीति शामिल हैं.

अगर नक्सलवाद की जड़ माने जाने वाले पश्चिम बंगाल की बात करें, तो वहां अब पूरी तरह शांति है. छत्तीसगढ़ जैसे राज्य, जो कभी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सबसे ऊपर थे, अब काफी हद तक इस समस्या से मुक्त हो चुके हैं. वहां कई कुख्यात नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में वापसी की है. लेकिन झारखंड इस मामले में पीछे नजर आता है.

विशेषज्ञों के अनुसार, झारखंड की भौगोलिक स्थिति अन्य राज्यों से काफी अलग है, जिसका फायदा माओवादी संगठन उठाते हैं. सारंडा का जंगल, जो एशिया में साल के घने जंगलों के लिए जाना जाता है, नक्सलियों के लिए सुरक्षित ठिकाना बना हुआ है. इस इलाके में भारी मात्रा में लौह अयस्क (आयरन) पाया जाता है, जो सुरक्षा बलों के लिए चुनौती पैदा करता है.

जानकारी के मुताबिक, नक्सली इस क्षेत्र में IED (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) लगाकर सुरक्षा बलों को निशाना बनाते हैं. कई बार अभियान के दौरान जवान इन विस्फोटकों की चपेट में आ चुके हैं. यह भी माना जाता है कि इलाके में खनिजों की अधिकता के कारण मेटल डिटेक्टर ठीक से काम नहीं करते, जिससे नक्सलियों को और बढ़त मिलती है.

वहीं, आत्मसमर्पण नीति की बात करें तो छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और तेलंगाना जैसे राज्यों की नीतियां अपेक्षाकृत अधिक प्रभावी साबित हुई हैं. इन राज्यों में नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने के लिए लचीली और प्रोत्साहन आधारित योजनाएं लागू की गईं. इसके विपरीत, झारखंड की नीति में कुछ सख्त प्रावधान हैं, जो नक्सलियों को आत्मसमर्पण करने से रोकते हैं. झारखंड में आत्मसमर्पण के बाद भी कई मामलों में जेल या ओपन जेल में रहने का प्रावधान है, जबकि अन्य राज्यों में उन्हें सीधे पुनर्वास और रोजगार से जोड़ा जाता है. यही वजह है कि यहां अपेक्षित संख्या में नक्सलियों ने हथियार नहीं डाले हैं.

छत्तीसगढ़ में सरकार और प्रशासन ने लगातार संवाद और अपील के जरिए नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया. वहां के गृह मंत्री तक ने सीधे बातचीत कर कई नक्सल नेताओं को आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित किया. झारखंड में इस तरह की सक्रिय पहल अपेक्षाकृत कम देखने को मिली है. फिलहाल सारंडा क्षेत्र में कुख्यात नक्सली नेता मिसिर बेसरा, असीम मंडल समेत 45 से अधिक सशस्त्र दस्ते सक्रिय बताए जाते हैं. सुरक्षा बल लगातार अभियान चला रहे हैं, लेकिन यह क्षेत्र अब भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है.

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