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जानिए किन-किन बड़े नेताओं की सियासत दांव पर, बाबूलाल से लेकर लुईस और सीता सोरेन के सियासी सफर पर लग सकता है विराम

BY -
Vinita Choubey  CE
Vinita Choubey CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
Published: November 18, 2024,
Updated: 5:42 PM

रांची (RANCHI): झारखंड विधानसभा चुनाव के पहले चरण की 43 सीटों के लिए मतदान शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न होने के बाद अब दूसरे और अंतिम चरण के चुनाव की बारी है. इस चरण में कुल 38 विधानसभा सीटों के लिए 20 नवंबर को मतदान होना है. इनमें से अधिकतर सीटें संथाल प्रमंडल और कोयलांचल इलाकों में स्थित हैं. दूसरे चरण को लेकर संताल प्रमंडल-कोयलांचल में चुनावी सरगर्मी तेज है. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन संथाल की बरहेट सीट से उम्मीदवार हैं. वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी कोयलांचल के गिरिडीह जिले की धनवार सीट से चुनाव लड़ रहे हैं. दोनों की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है. इसके साथ ही लुईस मरांडी को झामुमो ने जामा से प्रत्याशी बनाया है तो जामताड़ा से बीजेपी प्रत्याशी व सोरेन परिवार की बहु सीता सोरेन की भी प्रतिष्ठा दाव पर लगी है.

इसके बाद विधानसभा अध्यक्ष रवींद्रनाथ महतो की नाला सीट, मंत्री हफीजुल की मधुपुर सीट, इरफान अंसारी की जामताड़ा सीट, दीपिका सिंह पांडेय की महागामा सीट, बेबी देवी की डुमरी सीट भी हाई प्रोफाइल सीटों की श्रेणी में है. जामताड़ा में भाजपा ने इरफान अंसारी के खिलाफ सीता सोरेन को मैदान में उतारकर मुकाबला दिलचस्प बना दिया है. सीता सोरेन शिबू सोरेन की बड़ी बहू हैं. इस वजह से जामताड़ा की चर्चा पूरे राज्य में हो रही है.

झारखंड विधानसभा 2024 के चुनाव में देखा जाए तो बाबूलाल मरांडी से लेकर लुईस मरांडी और सीता सोरेन के सियासत दाव पर लगी है. आइए इन बड़े नेताओं के राजनीतिक सफर पर एक नजर डालते हैं और समझने की कोशिश करते हैं कि झारखंड विधानसभा चुनाव में बड़े खिलाड़ी कौन हैं और चुनाव में उनका क्या दांव पर है?

बाबूलाल मरांडी की होगी कठिन परीक्षा

झारखंड विधानसभा चुनाव में बड़े खिलाड़ियों में बाबूलाल मरांडी का नाम शामिल है. बाबूलाल मरांडी राज्य के पहले मुख्यमंत्री रह चुके हैं और फिलहाल बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) में शामिल होने और राजनीति में आने से पहले मरांडी एक स्कूल शिक्षक थे. झारखंड की राजनीति में मरांडी को उस समय जबरदस्त लोकप्रियता मिली जब उन्होंने 1998 और 1999 के लोकसभा चुनावों में जेएमएम प्रमुख शिबू सोरेन को उनके ही गढ़ दुमका में हराया था. लेकिन बाद में बीजेपी से उनके रिश्ते खराब हो गए और 2006 में उन्होंने झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) का गठन किया.

2019 का विधानसभा चुनाव हारने के बाद भाजपा ने बाबूलाल मरांडी की मदद के लिए हाथ बढ़ाया और 2020 में मरांडी भाजपा में वापस आ गए. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि झारखंड में आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों में से भाजपा ने 2014 में 11 सीटों के मुकाबले 2019 में सिर्फ दो सीटें जीतीं. जबकि झामुमो के नेतृत्व वाले गठबंधन ने राज्य की 28 में से 25 सीटें जीतीं.

झारखंड में हेमंत सोरेन के खिलाफ आदिवासी चेहरा लाने की मजबूरी को देखते हुए बीजेपी ने बाबूलाल मरांडी को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया है. बाबूलाल मरांडी को इस चुनाव में यह साबित करना है कि झारखंड की राजनीति पर उनकी पकड़ अभी भी कायम है. लोकसभा चुनाव में आरक्षित लोकसभा सीटों पर हार के बाद मरांडी की जिम्मेदारी और बढ़ गई है.

जेएमएम ने लुईस मरांडी पर लगाया दांव

झामुमो छोड़कर भाजपा में गई सीता सोरेन और बीजेपी छोड़कर JMM में गईं लुईस मरांडी के भाग्य का फैसला भी इस चरण में होगा. संथाल परगना में दिग्गज नेता के तौर पर पहचाने जाने वाली डॉ लुईस मरांडी वही नेता हैं जिन्होंने 2014 के विधानसभा चुनाव में हेमंत सोरेन को हराया था और रघुवर दास सरकार में कैबिनेट मंत्री बनी थीं. बीजेपी में 20 साल से ज्यादा वक्त बिताने के बाद इस बार 2024 के चुनाव में दुमका से टिकट नहीं मिलने से नाराज डॉ लुईस मरांडी बीजेपी छोड़कर जेएमएम में शामिल हो गई हैं और जेएमएम ने उन्हें अपनी सबसे मजबूत और परंपरागत जामा सीट से उम्मीदवार बनाया है. डॉ लुईस मरांडी का मुकाबला बीजेपी के सुरेश मुर्मू से है.

जामताड़ा में सीता की सीट पर रहेगी सबकी नजर

जामताड़ा विधानसभा सीट अनारक्षित है. इस बार झारखंड विधानसभा चुनाव में शिबू सोरेन की बड़ी बहू सीता सोरेन जामताड़ा से भाजपा के सिंबल पर चुनाव लड़ रही हैं. सीता के खिलाफ कांग्रेस से इरफान अंसारी मैदान में हैं. यहां देखें तो मुस्लिम और आदिवासी बहुल जामताड़ा अंसारी परिवार का गढ़ माना जाता है, जबकि सीता सोरेन अबतक जामताड़ा से चुनाव लड़ती रही हैं, लेकिन इस बार भाजपा ने उन्हें जामताड़ा भेज दिया है. अब देखना होगा कि सीता सोरेन के लिए ये राह कितनी आसान होती है. चुनाव का परिणाम क्या होगा जनता इनके वादे के साथ कितना जाती है और किस पर भरोसा दिखाती है, यह 23 नवंबर को साफ़ हो पायेगा. 

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