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झारखंड के सच्चे गांधीवादियों के बारे में जानिये, जिनकी सुबह ही तिरंगा पूजा से होती है

BY -
Shreya Gupta
Shreya Gupta
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 18, 2026, 8:07:25 PM

टीएनपी डेस्क (TNP DESK): आज घर-घर तिरंगा अभियान का शोर है. देश अपनी आजादी के अमृत उत्सव मनाया जा रहा है. लेकिन देश में एक समुदाय ऐसा भी है, जो सच्चा गांधीवादी है और उसकी सुबह ही तिरंगे की पूजा से होती है.ऐसा वो आज से नहीं कर रहे हैं, बल्कि एक सदी बीत गई उन्हें ऐसा करते हुए. झारखंड में इनकी आबादी दस हजार के करीब बताई है. बात जतरा टाना भगत समुदाय की है. जिन्हें अब टाना भगत के नाम से जाना जाता है. आज के दिन वो रांची में धरनारत हैं, उनकी बरसों पुरानी भूमि संबंधी मांग सरकार पूरा नहीं कर सकी है. चलिये आज उनके बारे में बताते हैं.

हर शाम होती है आंगन में पूजा

इस समुदाय ने 1917 में ही महात्मा गांधी को देवपुरुष मान लिया था, और तब से ही  तिरंगा को अपना सर्वोच्च प्रतीक मानते आये हैं. इनके घरों में सुबह-सुबह आंगन की सजावट होती हैं और इसी जगह तिरंगे झंडे की पूजा की जाती हैं. तिरंगे की पूजा के बाद ही इस समाज के लोग अन्न-जल ग्रहण करते हैं. आप सोच रहे होंगे की 1917 में तिरंगा कैसा रहा होगा, तो बता दें कि उस समय तिरंगे का स्वरूप अभी के जैसा ही था. बस फर्क इतना होता है  कि इनके घर-आंगन में जो तिरंगा फहरता है, उसमें अशोक चक्र की जगह चरखा का चिह्न् अंकित होता है. क्यूंकि आजादी के आंदोलन के दौरान तिरंगे का स्वरूप यही था.

दिखती हैं गांधी की छाप

टाना भगत की ज़िन्दगी पर महात्मा गांधी के आदर्श और साधारण जीवन शैली की परछाई हैं. खादी का कुरता और धोती पहने ये सहज और अहिंसा प्रिय लोग मांसाहारी भोजन से बेहद दूर रहते हैं. अहिंसा ही इनका धर्म और तिरंगा ही इनके भगवन हैं. गांधी के कर्म पथ पर चलते हुए इन्होंने हमेशा ही ब्रिटिश शासन के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाई और मालगुजारी नहीं देने, बेगारी नहीं करने और टैक्स नहीं देने का ऐलान किया.

जतरा उरांव थे इस जनजाति के सरदार

टाना भगत एक पंथ है, जिसकी शुरुआत जतरा उरांव ने 1914 में की थी. वह गुमला जिले के बिशुनपुर प्रखंड के चिंगारी नामक गांव के रहने वाले थे. जतरा उरांव ने आदिवासी समाज में पशु- बलि, मांस भक्षण, जीव हत्या, भूत-प्रेत के अंधविश्वास, शराब सेवन के विरुद्ध मुहिम शुरू की. इन्होंने टाना भगत समुदाय के लोगों के बीच सात्विक जीवन की नीव रखी. लोगों ने भी सदार की बात समझी और इस तरह इस पंथ की शुरुआत हुई. टाना भगत पंथ में शामिल हजारों अल्पसंख्याक लोगों ने ब्रिटिश हुकूमत के अलावा सामंतों, साहुकारों, मिशनरियों के खिलाफ आंदोलन किया था.

Tags:News

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