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लौहनगरी की बेटी को मिलेगा पद्मश्री सम्मान! 11 साल की उम्र से दे रही है आर्चरी में योगदान, पढ़ें  पूर्णिमा के संघर्ष की प्रेरणादायक कहानी

BY -
Priyanka Kumari CE
Priyanka Kumari CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 13, 2026, 10:50:38 AM

जमशेदपुर(JAMSHEDPUR):कहते हैं हौसला बुलंद हो तो फिर मुश्किलों की इतनी औकात है कि आपको आगे बढ़ने से रोक दे.इसी बात को लौहनगरी जमशेदपुर की पूर्णिमा महतो ने सच कर दिखाया है, जिन्होंने मात्र 11 साल की छोटी सी उम्र से आर्चरी में अपना दम दिखाया है.जिनके संघर्ष और प्रतिभा को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री देने की घोषणा की है.

गृह मंत्रालय से जब फोन आया तो पूर्णिमा को यकीन नहीं हुआ

वहीं इस पर पूर्णिमा ने बताया कि आज का दिन उनके लिए ऐतिहासिक है.गृह मंत्रालय से जब फोन आया तो यकीन नहीं हुआ उन्हें लगा कि कोई मजाक कर रहा है. लेकिन जब ऑफिशियल सूची जारी की गई.तब उन्हें यकीन हुआ कि उन्हें पद्मश्री से नावजा जाएगा. उन्होंने यह पुरस्कार अपने माता-पिता को समर्पित किया है, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं.

आर्चरी का कोच बनने का सफर इतना आसान नहीं था- पूर्णिमा

2010 में आर्चरी की कोच बनी पूर्णिमा ने बताया आर्चरी का कोच बनने का सफर उनके लिए इतना आसान नहीं था. 11 साल की उम्र में अपने घर के पास वाले ग्राउंड में बच्चों को तीरंदाजी करते हुए देखना उन्हे बड़ा अच्छा लगता था. पूर्णिमा घंटो बैठकर ऑब्जर्व करती थी, और सोचती थी कि वो शायद इसमे अच्छा कर सकती है. फिर एक  साल के लिए ग्राउंड बंद हो गया और पूर्णिमा आर्चरी की तलाश करते हुए बर्मा माइंस के समीप आर्चरी अकादमी पहुंच गई.

पूर्णिमा ने तीरंदाजी में अपना पूरा जीवन झोंक दिया

पूर्णिमा ने आगे बताया फिर यहीं से उनके नए सफर की शुरुआत हुई, और उन्होने तीरंदाजी में अपना पूरा जीवन झोंक दिया.कभी भी खेल के प्रति खानापूर्ति नहीं की और यही पूर्णिमा की सफलता का राज है कि जो भी काम करो पूरे मन, पूरी ईमानदारी और जिम्मेदारी पूर्वक करो. पूर्णिमा ने बताया यहां तक का रास्ता मेरे लिए इतना आसान नहीं था. कई चुनौती आई और सबसे बड़ा चुनौती थी कि अपने छोटे बच्चों को छोड़कर तिरंदाज़ी के लिए बाहर जाना. पूर्णिमा एक बार अपने 5 महीने के बेटे को छोड़कर लंदन के लिए रवाना हो गई थी.

पूर्णिमा ने खेल के साथ पति, दोनों बच्चों और परिवार को बखूबी संभाला

वहीं पूर्णिमा ने खेल के साथ पति, दोनों बच्चों और परिवार को बखूबी संभाला.पति का पूरा सहयोग रहा, तभी आज पूर्णिमा यहां खड़ी है. उन्होंने आगे बताया मेरे पति के अलावा सास ससुर इस मामले में बड़े सहयोगी है.उन्होंने कभी इस चीज को लेकर रोक टोक नहीं की कि आप इतने छोटे बच्चों को छोड़कर बाहर क्यों जा रहे हैं या फिर तुम्हारे बच्चों को कौन संभालेगा, घर पर बैठो, परिवार ने हमेशा पूर्णिमा को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया.इसके अलावा टाटा स्टील कंपनी काफी योगदान रहा.उन्हीं के क्लब में पूर्णिमा आर्चरी सिखती थीं और इसी क्लब में कोच भी है.

रिपोर्ट-रंजीत ओझा

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