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लीजिए! आउटसोर्स के इस जमाने में साइबर अपराध भी हो रहा आउटसोर्स,समझिए इसका पूरा अर्थतंत्र 

BY -
Samiksha Singh
Samiksha Singh
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 14, 2026, 1:23:10 AM

धनबाद(DHANBAD): झारखंड के जामताड़ा  साइबर गिरोह  की चर्चा राष्ट्रीय स्तर पर होने के बाद जामताड़ा के अपराधी अब ,जैसी की सूचना है, कमीशन पर काम करने पर अधिक जोर दे रहे हैं. जामताड़ा के साइबर अपराधी क्राइम अभी पूरी तरह से त्याग नहीं दिए है. अपराधी अब सीधे नहीं जुड़कर धंधे को आउटसोर्स पर बांट दे रहे हैं. यह आउट सोर्स सिर्फ झारखंड में ही नहीं हो रहा है बल्कि दूसरे प्रदेशों में भी किया जा रहा है. दूसरे प्रदेशों के बेरोजगार लड़कों को जामताड़ा बुलाया जाता है. उन्हें ट्रेनिंग दी जाती है. उसके बाद उन्हें वापस भेज दिया जाता है और शर्तों के मुताबिक साइबर अपराध करने पर कमीशन की रकम ली जाती है .

ऐसे चलता है ठगी का खेल 

कोई ऐसा प्रदेश नहीं है, जहां करोड़ों की ठगी नहीं हुई है. जिसे जी में आता है, साइबर अपराधी ठग लेते हैं. लेकिन दबाव बढ़ने पर जामताड़ा का गिरोह अब सीधे नहीं बल्कि छोटे-छोटे गैंग को यह काम सौंप दे रहे हैं. काम सौंपने के बाद निर्धारित परसेंटेज ले रहे हैं. इसके लिए बकायदा एक तरीका ढूंढ लिया गया है और उन सभी तरीकों के लिए अलग-अलग कमीशन की राशि फिक्स कर दी जा रही है. जानकारी के अनुसार बैंक खाते उपलब्ध कराने वाले को 10% कमीशन मिलता है. जितनी रकम इस खाते में आती है, उसका 10% खाताधारक को ईमानदारी पूर्वक दे दिया जाता है. फिर खाते से पैसा निकालने वाले गिरोह को 8% कमीशन मिलता है. इसी राशि पर यह गिरोह खुशी-खुशी काम करता है .इसके अलावा फोन करने वाले गिरोह भी हैं. यह गिरोह जिन से ठगी करता है, उसमें 25% उन्हें कमीशन मिलता है. डाटा उपलब्ध कराने वाला भी गिरोह है. इस गिरोह को लगभग 2% कमीशन निर्धारित किया गया है. फर्जी दस्तावेज पर सिम उपलब्ध कराने वाले भी हैं, उन्हें अलग से 2% कमीशन मिलता है. साइबर अपराध इतना अधिक बढ़ गया है कि हर एक राज्य सरकारों को अपने यहां इसके नियंत्रण के लिए विशेष व्यवस्था करनी पड़ रही है. झारखंड में तो यह इस तरीके से फैला हुआ है कि कोई भी ऐसे जिला वंचित नहीं है.

साइबर अपराधियों को जेल जाने कोई  डर नहीं

झारखंड सरकार को बाध्य होकर सभी जिलों में साइबर थाना खोलने की घोषणा  करनी पड़ी है. जामताड़ा जिले का हालत यह है कि यहां तो घर-घर में साइबर अपराध करने वाले मौजूद हैं. घरवाले फक्र से कहते हैं कि क्या होगा, कुछ दिन जेल में रह लेंगे लेकिन साइबर अपराध से उनकी दुनिया ऐश मौज में तो चल रही है. मतलब साइबर अपराधियों को जेल जाने कोई  डर नहीं है. उनके परिवार वालों को प्रतिष्ठा जाने का कोई मलाल नहीं है.  यह अपराध जिस रफ्तार से बढ़ रहा है, उसे देखते हुए इस पर नियंत्रण पाना सरकारों के लिए आगे चुनौती बन सकती है.

रिपोर्ट: धनबाद ब्यूरो 

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