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अगर 1932 खतियान बना स्थानीयता का आधार तो इन सांसद और विधायकों की राजनीति हो जाएगी गुल

अगर 1932 खतियान बना स्थानीयता का आधार तो इन सांसद और विधायकों की राजनीति हो जाएगी गुल

रांची (RANCHI): बात तीन साल पुरानी है. हेमंत सोरेन की अगुवाई में सरकार का गठन हुआ, हुआ ही था. झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन के एक बयान से तहलका मच गया था. बरवाअड्डा में गुरुजी ने कहा था कि झारखंड सरकार स्थानीय नीति में बदलाव करेगी. 1932 के खतियान के आधार पर स्थानीय नीति बनाई जाएगी. उनके बयान का गठबंधन सरकार के प्रमुख घटक कांग्रेस ने ही सबसे पहले विरोध किया था. लेकिन पार्टी की ओर से यह भी कहा गया था कि किसी को भी डरने की जरूरत नहीं है. जन भावनाओं के अनुरूप स्थानीय और नियाेजन नीति बनाई जाएगी. इसका निर्णय गठबंधन के सभी दल मिलकर करेंगे. लेकिन यह सरकार इसे जल्द तय जरूर करेगी. जाहिर है, 32 खतियान का तब कांग्रेस ने समर्थन नहीं किया था. कल जब कैबिनेट की बैठक के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन बाहर निकले और उनके स्वागत में भीड़ जयकारे लगा रही थी. शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो ने खतियान के नारे लिखे गमछे जब सीएम को ओढ़ाए और बारी-बारी से सभी को ओढ़ाए गए तो बन्ना के चेहरे की उदास पढ़ी जा सकती थी. आपने भी गौर किया होगा.

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तब गुरुजी के बयान पर हुआ था हंगामा

खैर बात गुरुजी के तब के बयान और उसपर उठे बवाल की कर रहा था. तब भाजपा ने कहा था कि पहले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपना स्टैंड क्लीयर करें कि वह राज्य के सवर्मान्य नेता के बयान से सहमत हैं या नहीं. तभी भाजपा कुछ कहने की स्थिति में होगी. अब जब हेमंत सरकार ने अपनी स्थिति साफ कर दी है, तो भाजपा की चुप्पी समझ में नहीं आ रही है. हालांकि कांग्रेस के आदिवासी नेता व पूर्व सीएम मधु कोड़ा ही 32 खतियान के खिलाफ खड़े हो गए हैं. उनका कहना है, कोल्हान में सर्वे सेटलमेंट 1964, 65 और 70 में किया गया था. ऐसी परिस्थिति में 1932 के खतियान को स्थानीयता का आधार बनाना किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है. अगर ऐसा हो गया ता कोल्हान के लाख लोगों को बेघर-बार होना पड़ेगा. चलिये इसके राजनीतिक गुणाभाग को ही समझते हैं.

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रोजी-रोटी की तलाश में विस्थापन

रोजी-रोटी की तलाश में विस्थापन और पलायन कोई नई बात नहीं है. झारखंड में भी जब कल-कारखाने लगने शुरू हुए तो बड़ी तादाद में लोग दूसरे जिले और राज्य से भी आए. तक बिहार अविभाजित था. लोगों ने घर-द्वार बनाए और यहीं बस गए. उनके बच्चों ने यहीं से पढ़ाई-लिखाई की. 32 का खतियान का असर उन जिलों पर भी अधिक पड़ेगा, जिसकी सीमा दूसरे राज्यों से मिलती हैं. इसमें बंगाल, उड़ीसा और बिहार से लगे जिले शामिल हैं. इसके बाद उन जगहों पर असर पड़ेगा, जहां विकास की मीनारें खड़ी की गईं, इनमें जमशेदुपर, बोकारो, धनबाद, झरिया, सिंदरी और रांची जिले शामिल हैं. इन इलाके की करीब 60 से 70 फीसदी आबादी के सामने स्थानीयता का संकट खड़ा हो जाएगा. भाजपा और कांग्रेस के लिए इसका उलटा असर हो सकता है, क्योंकि उनके वोट बैंक में बाहर के सामान्य वर्ग के लोगों का प्रतिशत अधिक है.

इन नेताओं पर राजनीतिक संकट

अगर स्थानीयता का आधार 1932 का खतियान मान लिया गया तो जैसा हमने बताया दूसरे राज्य के लोगों पर असर पड़ेगा और अधिकतर ये भाजपा और कांग्रेस के वोटर्स हैं. भाजपा नेता व एक्स सीएम रघुवर दास मूलत: छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव के रहने वाले हैं. उनके सीएम रहते भी यह मुद्दा जमकर उठा था. दिक्कत ये है कि मुख्यमंत्री रहते हुए कभी बाबूलाल मरांडी ने इस 32 वाले खतियानी स्थानीयता को लागू करने का प्रयास किया था. तब भी वो भाजपा में थे और आज फिर भाजपा में हैं, उनका बयान अबतक नहीं आया है. भाजपा के सभी नेताओं को इस विषय पर कुछ भी कहने से मानो मानो मना कर दिया गया हो, इसलिए सभी मीडिया को देख कतरा रहे हैं. खतियानी गाज सरकार में शामिल मंत्रियों पर भी गिर सकती है. इनकी खामोशी ही बहुत कुछ बयान कर देती है. उनके समक्ष सांप-छुछंदर वाली स्थिति हैं. बन्ना गुप्ता सरकार में मंत्री हैं, लेकिन जमशेदपुर के जिस इलाके से चुन कर आते हैं, वहां बिहार के लोगों की खासा आबादी है. वो पहले 32 खतियान के विरोधी रहे हैं. झामुमो कोटे से मिथिलेश ठाकुर भी मंत्री हैं. वो पलामू से आते हैं. उनका वोट बैंक आधार भी बाहर के लोगों पर निर्भर है, इन सबके अतिरिक्त कई पार्टियों के विधायक और सांसद भी हैं, जो मूलत: बाहर के हैं, और उनके वोटरों में भी बड़ी संख्या उनकी ही है. इनमें भाजपा के हजारीबाग से सांसद व पूर्व मंत्री जयंत सिन्हा, उनके पिता व पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा पर भी तलवार लटकी है. इधर, बोलने से सभी ने चुप्पी की चादर तान ली है. धनबाद से BJP विधायक राज सिन्हा तो झरिया से कांग्रेस विधायक पूर्णिमा नीरज सिंह ने भी बयान देने से मना कर दिया है. कहा कि इस मामले पर कुछ नहीं कहना. सवाल उठना लाजमी है कि क्या इनके राजनीतिक सफर का अंत हो जाएगा या ये अब अपने परंपरागत वोटरों से पिंड छुड़ा लेंगे.

इनके लिए एक शेर याद आता है:

न सनम ही मिला ना विसाले सनम

न इधर के रहे ना उधर के रहे.

अब हेमंत सोरेन ने एक मास्टर स्ट्रोक देकर विरोधियों की जबान पर फिलहाल ताला तो जड़ ही दिया है, आगे-आगे देखिये होता है क्या.

 

 

 

Published at:15 Sep 2022 03:39 PM (IST)
Tags:News
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