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विस्थापितों के आंदोलन के बहाने चंपाई सोरेन ने कैसे पकड़ ली है अलग राह, क्या होगा राजनीतिक फ़ायदा ?

BY -
Satya Bhushan Singh   Dhanbad
Satya Bhushan Singh Dhanbad
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: April 10, 2026, 2:46:46 PM

टीएनपी डेस्क (TNP DESK): झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और कोल्हान टाइगर के नाम से प्रसिद्ध चंपाई सोरेन क्या अब विस्थापन के आंदोलन में अपनी राजनीतिक जमीन खोज रहे हैं. उन्होंने ऐलान कर दिया है कि विस्थापितों को हर हाल में न्याय दिला कर रहेंगे. शुक्रवार को उन्होंने अपने फेसबुक पर एक पोस्ट कर कहा है, याचना नहीं अब रण होगा! साथ में हल चलाने की तस्वीर भी है. बताया जाता है कि यह आंदोलन बोकारो से शुरू हुआ है और हर जगह पर पहुचेंगा. जहां के लोग विस्थापन का दंश झेल रहे हैं, उन्होंने ऐलान कर दिया है कि बोकारो स्टील प्लांट के लिए अधिग्रहित जमीन जो खाली है, उस पर विस्थापितों का हक होगा. 

 

तो क्या चंपाई सोरेन ने अब एक अलग राह पकड़ ली है ?  

मतलब साफ है कि चंपाई  सोरेन अब एक अलग राह पकड़ चुके हैं और झामुमो छोड़ने के बाद फिर से वह अपनी राजनीतिक जमीन झारखंड में खोज रहे है. यह बात सही है कि विस्थापन के आंदोलन में उनको समर्थन मिलेगा, क्योंकि कोई भी विस्थापन की नीति कारगर नहीं हुई है. बोकारो में कुछ महीने पहले विस्थापितों के आंदोलन में एक होनहार युवक की जान चली गई थी. उसके बाद पक्ष और विपक्ष के सभी नेता बोकारो पहुंचे थे.अपनी-अपनी बातें कही थी, लेकिन धीरे-धीरे यह आंदोलन कमजोर पड़ गया. फिर एक बार चंपई दादा ने आंदोलन की कमान संभाली है.  

चार दिन पहले आंदोलन की दी थी चेतावनी

चार दिन पहले भी उन्होंने फेसबुक पर पोस्ट कर कहा था कि विस्थापितों के साथ अन्याय हो रहा है, उन्होंने इसके लिए आंदोलन करने की बात कही थी. उन्होंने बोकारो स्टील प्लांट को निशाने पर लिया था. साथ ही चांडिल,मसानजोर, पंचेत, मैथन, घाटो के रैयतों की समस्या के समाधान का तरीका भी बतया था. उन्होंने कहा था कि रैयतों के साथ न्याय नहीं हुआ तो वह बड़ा आंदोलन शुरू करेंगे और बोकारो स्टील प्लांट की खाली पड़ी जमीन पर हल चला कर कब्जे में लेंगें. उन्होंने कहा है कि बोकारो स्टील प्लांट के लिए करीब 34,000 एकड़ जमीन का अधिग्रहण 1960 के दशक में हुआ था, जिसमें मात्र आधी जमीन पर प्लांट बना, अन्य निर्माण हुए और हजारों एकड़ जमीन आज भी खाली है. 

क्या कहता है भूमि अधिग्रहण कानून 2013 की धारा 24(2)

भूमि अधिग्रहण कानून 2013 की धारा 24(2) के अनुसार पुराने अधिग्रहण के मामलों में यदि सरकार के पास भौतिक कब्जा (बाउंड्री) नहीं है, या फिर मुआवजा का भुगतान नहीं हुआ है, तो अधिग्रहण प्रक्रिया स्वतः समाप्त मानी जाएगी. जब राज्य सरकार/ कंपनी ने भूमि अधिग्रहण के समय जो वादे किए थे, उन्हें पूरा नहीं किया गया, विस्थापितों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया, हजारों विस्थापित परिवारों को मुआवजा नहीं मिला और हजारों एकड़ जमीन के सैकड़ों गांवों में आज भी लाखों लोग बसे हुए हैं, तो यह अधिग्रहण प्रक्रिया पूरी कैसे हुई? सवाल किया था कि जब आप 60 वर्षों तक भूमि का इस्तेमाल नहीं कर पाए और उसके कई हिस्सों पर आपका कब्जा भी नहीं है, तो उस जमीन को रैयतों को क्यों नहीं लौटाया जा रहा है? 

बोकारो के विस्थापितों के साथ किया गया है अन्याय

कम से कम वे लोग उस पर खेती-बाड़ी कर के, अपने परिवार का पालन-पोषण तो कर सकेंगे. बोकारो में विकास के नाम पर 64 मौजों की भूमि अधिग्रहित हुई थी, लेकिन इनमें से सैकड़ों गांवों में पुनर्वास, मुआवजा और स्वामित्व को लेकर दशकों से विवाद चल रहा है. इस जमीन पर लाखों लोग रहते हैं, जो पंचायत से बाहर होने के कारण सरकारी योजनाओं (पानी, बिजली, सड़क, स्वास्थ्य आदि) से वंचित हैं. इन लोगों का नाम वोटर लिस्ट में तो है, लेकिन एक जन्म/ मृत्यु प्रमाण पत्र तक बनवाना इनके लिए मुश्किल है, क्योंकि इनके गांवों/ टोलों को सरकारी रिकॉर्ड्स में गायब कर दिया गया है. उनके अस्तित्व को मिटाने की कोशिश हो रही है, लेकिन दूसरी ओर अवैध तरीके से उनकी पुस्तैनी जमीन पर शॉपिंग मॉल बन रहे हैं, कैसे? किस की अनुमति से? 

कौन दे रहा मॉल बनाने की अनुमति ?

झारखंड में औद्योगिक जोन/ लैंड को कमर्शियल (मॉल, शॉपिंग सेंटर) में बदलने के लिए लैंड यूज कन्वर्जन (भूमि उपयोग परिवर्तन) की अनुमति लेनी पड़ती है. भूमि राजस्व विभाग और संबंधित शहरी स्थानीय निकाय (नगर निगम आदि) के तहत यह प्रक्रिया होती है. जब बोकारो का यह क्षेत्र किसी नगर निकाय के अंतर्गत नहीं आता, तो यहां मॉल बनाने की अनुमति कौन दे रहा है? कैसे? सन 1973 में बोकारो स्टील प्लांट के प्रशासन ने घोषणा की थी कि 20 मौजा की भूमि अब प्लांट के लिए जरूरी नहीं है, क्योंकि प्लांट के पास पहले से ही अतिरिक्त (surplus) भूमि उपलब्ध थी. बावजूद मूल रैयतों को उनकी भूमि का कानूनी स्वामित्व वापस नहीं दिया गया. वे लोग अपने मूल गांवों में ही रहते रहे, लेकिन उनकी जमीन पर आधिकारिक रूप से कब्जा प्लांट/ सरकार के नाम बना रहा. जिसके फलस्वरूप वे न तो पूर्ण मुआवजा पा सके, न नौकरी, और न ही जमीन का कानूनी अधिकार. इसके लिए कौन जिम्मेदार है? इन विस्थापितों की कई पीढ़ियां इसमें तबाह हो गईं. उसकी क्षतिपूर्ति कौन करेगा? 

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