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गरीबी की मार, होकर लाचार, एक मजबूर आदिवासी युवक कैसे बन गया नक्सली, जानिए पूरी कहानी

BY -
Vinita Choubey  CE
Vinita Choubey CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 16, 2026, 10:31:45 PM

बोकारो (BOKARO) : किसी ने सच ही कहा है, कि लालच बहुत बुरी बला है. इसके चंगुल में आकर बहुत से लोग अपनी बर्बादी की राह पकड़ लेते हैं. एक ऐसा ही वाक्या बोकारो जिले के गोमिया प्रखंड क्षेत्र से सामने आया है. जहां एक मजबूर आदिवासी युवक को नक्सलियों के द्वारा लालच के मकड़जाल में फंसाकर नक्सली बनने में मजबूर कर दिया जाता हैं. नक्सलियों ने उस मजबूर आदिवासी युवक को पक्का घर, खेती के लिए एक जोड़ा बैल एवं बेहतर जिंदगी देने का वादा कर नक्सली बना दिया जाता है. परन्तु उस आदिवासी को क्या पता कि नक्सली बनने के बाद उसके किस्मत में सिर्फ बर्बादी ही लिखी होगी.

फूलचंद का कैसे हुआ नक्सलियों से सम्पर्क

गोमिया थाना क्षेत्र का नक्सली फूलचंद किस्कू उर्फ राजू जो लगभग 10 वर्ष पूर्व जिलगा जंगल मे लकड़ी काटने गया हुआ था. तभी कुख्यात नक्सली चंचल दा का दस्ता वहां से विचरण कर रहा था. उस दस्ते में प्रयाग मांझी उर्फ विवेक दा उर्फ करम दा सहित अन्य नक्सली भी शामिल थे. इस दौरान नक्सलियों की नजर उस मजबूर गरीब आदिवासी युवक फूलचंद किस्कू के ऊपर पड़ी. नक्सलियों के द्वारा खेती करने के लिए एक जोड़ा बैल, पक्का घर के साथ बेहतर जिंदगी देने का वादा कर उसे उग्रवादी संगठन में मिला लिया गया था. परन्तु उसे आज तक न ही पक्का घर मिला, न ही खेती करने के लिए एक जोड़ा बैल मिला. इतना ही नही, फूलचंद किस्कू को दिए गए वादे को पूरा करने के लिए संगठन में शामिल करने वाला कोई सदस्य भी जिंदा नही बच पाया . गिरोह के लगभग सभी सदस्य पुलिस-नक्सली मुठभेड़ में मारे जा चुके है. यदि  कुछ बच गया है तो वो है फूलचंद किस्कू से किया हुआ वादा और फूलचंद किस्कू के ऊपर 15 से अधिक हत्या, लूट, डकैती, रंगदारी, सरकारी सम्पत्ति को क्षति करने जैसे संगीन आपराधिक मामले.

जानकारी के अनुसार फूलचंद किस्कु का घर गोमिया थाना क्षेत्र के सुदूरवर्ती क्षेत्र घने जंगल के बीचों बीच धमधरवा गांव में है . फूलचंद किस्कू का घर गांव से करीब 1 km सुनसान एकांत जंगल में है. गांव से फूलचंद के घर जाने का केवल एक पैदल मार्ग है.

आज से करीब दो माह पूर्व एक विशेष अभियान के तहत जब पुलिस फूलचंद किस्कु के घर गई थी. तो पुलिस को अपने आंखों पर विश्वास नहीं हुआ. उस समय पुलिस के मन में सबसे पहला प्रश्न यही आया कि अपराध ने इसे इतना दरिद्र बनाया, या फिर दरिद्रता ने इसे अपराधी बना दिया. फूलचंद किस्कू का घर की दीवारें मिट्टी की हैं, जिनमें बरसात के निशान अब तक जमे हुए हैं. छत पर बांस और पुराने टिन के टुकड़े किसी तरह टिके हैं, जो हर हवा के झोंके में हिलते हैं, मानो गिर पड़ेंगे. दरवाज़े की जगह फटे कपड़े का पर्दा लटका है और टीना का टाटी लगा हुआ है.

पुलिस को घर में फूलचंद तो नहीं मिला. अलबत्ता घर मे मिली फूलचंद की बहु. जहां जीवन अत्यंत फटेहाली में नजर आई . फूलचंद के अपराधी होने के कारण न ही उसके परिवार के किसी सदस्य का आधार कार्ड बन पाया है, और न ही कोई सरकारी योजना का लाभ मिल पा रहा है . फूलचंद के परिवार को गांव वाले तिरस्कार की भावना से देखते है . पुलिस ने फूलचंद के बहु को झारखंड सरकार के आत्मसमर्पण नीति को विस्तृत रूप से समझाया और फूलचंद को पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कराने का निर्देश दिया . लेकिन उसके चेहरे का हाव-भाव और बोल-चाल फूलचंद को आत्मसमर्पण करने के पक्ष में नहीं दिखाई दिए. 3-4 दिन बीत जाने पर भी कोई जवाब नहीं मिलने पर पुलिस के द्वारा पुनः एक टीम का गठन कर फूलचंद किस्कू के विरुद्ध छापामारी किया गया. फलस्वरूप फूलचंद को उसके घर के समीप जंगल से गिरफ्तार कर न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया.

अब जरा सोचिए कि क्या बेहतर जिंदगी पाने के लालच में अपराध के रास्ते जाना जरूरी है, या सही राह में चलकर जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए मेहनत करना जरूरी है. क्योंकि मेहनत करने का समय हर किसी का आता है, हौसलों से मेहनत करने वाले ही सफलता को गले लगाते हैं. इसलिए मेहनत करो इतनी खामोशी से कि सफलता भी शोर मचा दें. ये कहानी थी एक अत्यंत गरीब अति पिछड़ा आदिवासी युवक की, जिसे पक्का घर, खेती करने के लिए एक जोड़ा बैल और बेहतर जिंदगी देने का वादा कर नक्सलियों के द्वारा उसके सम्पूर्ण जीवन को बर्बाद कर दिया गया.

रिपोर्ट-संजय कुमार

 

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