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दिशोम गुरु शिबू सोरेन को सम्मान : धनबाद की टुंडी खुश तो है लेकिन यह ख़ुशी क्यों आधी-अधूरी है !

दिशोम गुरु शिबू सोरेन को सम्मान : धनबाद की टुंडी खुश तो है लेकिन यह ख़ुशी क्यों आधी-अधूरी है !

धनबाद (DHANBAD) : दिशोम  गुरु शिबू सोरेन को पद्म भूषण मिलने की खुशी धनबाद की टुंडी को तो है, लेकिन यह खुशी आधी अधूरी है. टुंडी गुरु जी को भारत रत्न देने की मांग करती है. वैसे, झारखंड मुक्ति मोर्चा भी पहले शिबू सोरेन को भारत रत्न देने की मांग की थी.  लेकिन फिलहाल उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया है.  शुरुआती दिनों में टुंडी ही उनका कार्यक्षेत्र था और टुंडी को ही केंद्र में रखकर वह महाजनी व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन शुरू किया था और इसी आंदोलन से उठी आग की वजह से झारखंड अलग राज्य बना. अपने राजनीतिक जीवन में उन्होंने संघर्ष का रास्ता चुना, हालांकि कई बार लोकसभा और राज्यसभा का प्रतिनिधित्व भी किया.  

तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री भी रहे. केंद्र में कोयला मंत्री के रूप में भी काम किया

तीन बार झारखंड के मुख्यमंत्री भी रहे. केंद्र में कोयला मंत्री के रूप में भी काम किया.  नके नेतृत्व में आदिवासी समाज अपने उत्थान और समानता के लिए लगातार संघर्ष किया. 1977 में उन्होंने टुंडी विधानसभा क्षेत्र से पहले चुनाव लड़ा, लेकिन सफलता नहीं मिली. इस हार ने  उनको इतना दुखित कर दिया कि वह टुंडी इलाका छोड़कर दुमका शिफ्ट कर गए. फिर दुमका और संथाल  को अपना राजनीतिक केंद्र बना लिया. 1980 में वह लोकसभा का चुनाव दुमका से ही जीते. उनके पूरे जीवन में कई विवाद भी आए, लेकिन आदिवासी समाज में उनकी लोकप्रियता बनी रही. उनका निधन 4 अगस्त 2025 को नई दिल्ली में हुआ. टुंडी के मनियाडीह में शिबू आश्रम आज भी उनके आंदोलन का गवाह है. वह अपने आंदोलन में साथियों के साथ यहां बैठक करते थे. टुंडी से शुरू हुई अलग झारखंड राज्य की लड़ाई अभिवाजित बिहार के समय पूरे संथाल-कोल्हान क्षेत्र में फैल गई थी. 80 के दशक के बाद झामुमो ने संसदीय व्यवस्था में भी अपनी पकड़ बनानी शुरू कर दी.  एकीकृत बिहार में झामुमो ने अपनी राजनीतिक धमक शिबू सोरेन के नेतृत्व में बनाए रखी.  

लंबी लड़ाई के बाद 15 नवंबर 2000 को मिला अलग राज्य 
 
लंबी लड़ाई के बाद 15 नवंबर 2000 को अलग झारखंड राज्य की स्थापना हुई. 2024 में गठबंधन को प्रचंड बहुमत मिला ही, झारखंड मुक्ति मोर्चा भी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई. यह अलग बात है कि 2024 के पहले इतनी बड़ी संख्या में झारखंड मुक्ति मोर्चा को सीट नहीं आई थी. शिबू सोरेन कोई व्यक्ति नहीं ,बल्कि एक विचार थे. उनके विचार आगे भी नई पौध को प्रेरणा देती रहेगी. उन्होंने एक ऐसी नई पौध तैयार कर दी है, जो अब पीछे मुड़कर नहीं देखेगी. शिबू सोरेन का जीवन कोई आसान नहीं था. पिता की हत्या के बाद इतनी विचलित हुए कि जमींदारों के जुल्म के खिलाफ ही लड़ाई छेड़ दी. पूरा जीवन लड़ते रहे और अपनी हर जनसभा में लोगों से दारु-शराब से दूर रहने और पढ़ाई की ओर ध्यान लगाने की अपील करते रहे. अगर शिबू सोरेन के जीवन का अवलोकन किया जाए, तो कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन अपनी  सोच और विचार से नहीं डिगे. 

औरों की राह तो अलग हो गई लेकिन शिबू सोरेन न हिले और न डिगे 
 
1972 में ही एके राय, विनोद बाबू के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा का धनबाद में गठन किया. मतलब आज से 55 साल पहले ही उन्होंने अलग राज्य की कल्पना कर ली थी. यह अलग बात है कि समय के साथ सबकी राह अलग हो गई लेकिन शिबू सोरेन ने जिस लकीर को पकड़ा, उस पर अंत-अंत तक चलते रहे. उनका सपना 2000 में पूरा हुआ, जब झारखंड बिहार से अलग हो गया. शिबू सोरेन की अगुवाई में कई बड़े आंदोलन हुए, तब जाकर वर्ष 2000 में अलग राज्य का सपना पूरा हुआ. 1994 में शिबू सोरेन को जेल भी जाना पड़ा, हालांकि बाद में वह जिस मामले में जेल गए थे, उसमें बरी  हो गए.  शिबू सोरेन ने सिर्फ एक आंदोलन ही नहीं खड़ा किया, बल्कि एक मजबूत नई पौध भी तैयार कर दी. उनके पुत्र हेमंत सोरेन आज झारखंड के मुख्यमंत्री हैं और वह भी पिता के रास्ते चलने की कोशिश कर रहे है. 

रिपोर्ट-धनबाद ब्यूरो

Published at:27 Jan 2026 07:27 AM (IST)
Tags:DhanbadJharkhandShibu SorenSammanTundi
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