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हेमंत सोरेन के पास विधायकों का प्रचंड समर्थन, मगर, विश्वासमत के बाद भी सरकार कितनी सुरक्षित!

BY -
Prakash Tiwary
Prakash Tiwary
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 13, 2026, 6:34:43 PM

रांची(RANCHI): झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार ने 5 सितंबर को विधानसभा का एक दिन का विशेष सत्र बुलाया. इस सत्र में सरकार की ओर से मुख्यमंत्री ने विश्वास प्रस्ताव पेश किया और 48 विधायकों के समर्थन से जीत भी लिया. मगर, इस एकजुटता और ताकत दिखाने के पीछे भी एक सवाल उठ रहा है. ये सवाल है कि आखिर सरकार विश्वासमत हासिल करने के बाद भी क्या सुरक्षित है!

क्यों उठ रहा सवाल

ये सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि खनन लीज मामले में चुनाव आयोग ने अपना फैसला राज्यपाल को भेजा है. मगर, राज्यपाल ने अपना फैसला अभी तक सार्वजनिक नहीं किया है. राज्यपाल कभी भी अपना फैसला सुना सकते हैं. अगर, राज्यपाल का फैसला हेमंत सोरेन के खिलाफ आता है तो मुख्यमंत्री को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ सकता है. मगर, इसमें भी पेंच है. हेमंत सोरेन की सिर्फ सदस्यता जाती है तो वो इस्तीफा देकर तुरंत ही राज्यपाल को अपने सभी विधायकों का समर्थन पत्र सौंप सकते हैं. मगर, यदि हेमंत सोरेन की सदस्यता रद्द होने के अलावा उनके चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगती है, क्योंकि ये सभी चीजें संभव हैं. या मुख्यमंत्री नैतिकता के आधार पर अपनी जगह किसी और को सीएम बनाना चाहते हैं तो ऐसे में झामुमो के अंदर से किसी नए चेहरे को सीएम की कुर्सी पर देखा जा सकता है. या झामुमो के बाहर से भी किसी को सीएम की कुर्सी मिल सकती है. इसकी संभावना कम है. मगर, राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है. लेकिन दोनों ही सूरतों में चाहे मुख्यमंत्री की सदस्यता जाती है या उनकी जगह कोई और सीएम बनता है. तो सीएम हेमंत सोरेन ने आज जो विश्वासमत हासिल किया है, उसमें दरार पड़ सकती है. इससे यूपीए को सरकार बनाने में बहुमत जुटाना मुश्किल हो सकता है और राज्य राष्ट्रपति शासन की ओर रुख कर सकता है. कहा तो ये भी जा रहा है कि राज्यपाल खुद ही राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुशंसा कर सकते हैं. ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि राजनीति में सब कुछ संभव है.

विश्वास प्रस्ताव से राजभवन पर दबाव बनाने का प्रयास

लेकिन आज विधानसभा में विश्वासमत हासिल कर हेमंत सोरेन ने मीडिया के माध्यम से या सीधे तौर पर राजभवन पर दबाव बनाने और एक perception तैयार करने की कोशिश जरूर की. जानकारों का मानना है कि एक दिवसीय विशेष सत्र में विश्वास मत प्रस्ताव लाकर सरकार अपनी एकजुटता दिखाना चाहती थी. इस प्रस्ताव के साथ ही सरकार राजभवन में दबाव बढ़ाना चाहती थी. ताकि राज्यपाल हेमंत सोरेन से जुड़े मामले का पत्र जल्द सार्जवजनिक करने को मजबूर हो जाए. सरकार ने दिखा दिया कि बहुमत अभी भी उनके साथ है. भारत निर्वाचन आयोग का फैसला अगर हेमंत सोरेन के खिलाफ भी आता है तब भी हमारे पास पर्याप्त बहुमत है.

विपक्ष के खिलाफ यूपीए का एकजुटता का संदेश

सत्र के दौरान विश्वास प्रस्ताव लाकर सरकार ने ये भी दिखा दिया कि पूरी यूपीए एकजुट है. सरकार में टूट की बात महज विपक्ष और मीडिया की अफवाह है. सरकार के इस कदम में विपक्ष पूरी तरह बैकफूट में नजर आ रही है. विपक्ष के हौसले थोड़े कम हुए हैं और सरकार ने अपनी एकता का परिचय दिया है. इसके साथ ही सरकार ने जनता के बीच एक संदेश दिया है कि आपकी चुनी हुई सरकार पूरी तरह सुरक्षित है और हम सभी विधायक साथ हैं.  

 

 

Tags:News

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