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कड़ी मेहनत और सीखने की ललक ने बदला मोहली समाज की तकदीर, सूप-दउरा की जगह कर रहें बम्बू क्राफ्टिंग

कड़ी मेहनत और सीखने की ललक ने बदला मोहली समाज की तकदीर, सूप-दउरा की जगह कर रहें बम्बू क्राफ्टिंग

धनबाद(DHANBAD):कभी सूप और दउरा बनाकर मुश्किल से गुजर-बसर करने वाली महिलाएं और युवतियां आज बांस से बने आकर्षक लैंप, गिफ्ट आइटम और डेकोरेटिव सामान तैयार कर रही है. बम्बू क्राफ्ट की ट्रेनिंग ने न सिर्फ इनके हुनर को नई उड़ान दी, बल्कि आमदनी के नए रास्ते भी खोले. चलिए जानते है आखिर धनबाद के मोहली समाज ने कैसे बांस के सूप-दउरा से बम्बू क्राफ्टिंग तक का सफर तय किया.

आधुनिकता की दौड़ में नई तकनीक और चीजों ने परंपरा को दी मात

परंपरा और घरेलू उत्पाद, कभी आमदनी और गुजारा का एक बड़ा जरिया हुआ करता था, लेकिन समय बदला और आधुनिकता की दौड़ में नई तकनीक और चीजों ने परंपरा को मात दे दी. जिससे गुजर-बसर करना तक मुश्किल हो गया और दुश्वारियां बढ़ती चली गयी. एक समय ऐसा भी गुजरा कि नई पीढ़ी ने अपनी पारंपरिक कारीगरी तक को छोड़ने को तैयार थे. आखिरकार उनके हुनर और पारंपरिक उत्पाद को एक नया आयाम मिला. अपने कौशल से हाथ के हुनर को तराशा और परंपरा को आधुनिकता की दौड़ में ला खड़ा किया. आज इनकी जिंदगी पर्व-त्योहार के उत्पाद तक सीमित नहीं है, बल्कि महानगरों में लगने वाले राष्ट्रीय मंच में भी इनके हुनर का जलवा है.

करीब 400 महिलाएं बनी आत्मनिर्भर

आज धनबाद के बलियापुर प्रखंड के बरमुड़ी, घोघाबाद, बेलगड़िया, मोहली टोला और सिरसा कुंडी में रहने वाली करीब 400 महिलाएं आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बन रही है. इनमे ज्यादातर महिला और पुरुष मोहली समाज से आते है.इस काम में जुटी युवतियों का कहना है कि वे पारंपरिक सूप और दउरा बनाने का काम नहीं करना चाहती थी. इसकी वजह थी उनके माता-पिता पीढ़ियों से यही काम करते आ रहे थे, इसके बावजूद घर की आर्थिक स्थिति हमेशा कमजोर रही.इससे परिवार का भरण-पोषण भी बड़ी मुश्किल से हो पाता था. वहीं, जब बम्बू क्राफ्ट के तहत उन्हें नई-नई चीजें बनाने की ट्रेनिंग मिली है, तब से उनकी सोच बदल गई. अब न सिर्फ इस पारंपरिक काम में इनका मन लगने लगा है, बल्कि आमदनी भी पहले से कहीं बेहतर हो गई है. बांस से तैयार किए गए उत्पादों की बिक्री के लिए उन्हें दूसरे बड़े राज्यों में जाने का अवसर भी मिल रहा है.

ट्रेनिंग के दौरान बांस से आकर्षक लैंप, घर सजाने के सामान बनाना सीखाया गया

क्राफ्टिंग का कार्य कर रही महिलाओं ने बताया कि ट्रेनिंग के दौरान उन्होंने बांस से आकर्षक लैंप, घर सजाने के सामान और डेकोरेटिव आइटम बनाना सीखाया गया. जिसके चलते कभी अभाव में जीवन गुजारने वाली ये महिलाएं अब आत्मनिर्भर बन चुकी है. पहले सूप और दउरा का निर्माण सिर्फ त्योहारों के समय होता था, बाकी दिनों में वे बेरोजगार रहती थी. अब उनके पास पूरे साल काम रहता है और आमदनी भी लगातार हो रही है.

सूप, दउरा और हाथ पंखा बनाना पारंपरिक कार्य

टिंकर हट फाउंडेशन की माने तो बम्बू क्राफ्ट से जुड़े इस कार्य में मोहली समाज की महिलाएं और युवतियां शामिल है. जिनकी सूप, दउरा और हाथ पंखा बनाना पारंपरिक कार्य रही है, लेकिन कम आमदनी के कारण युवा वर्ग इससे दूर होने लगे थे. आधुनिकता के दौर में प्लास्टिक के चलन से बांस के सामान की मांग भी घट गई, जिससे इस पेशे को लेकर नकारात्मक सोच बन गई थी.इसको लेकर टिंकर हट फाउंडेशन ने ऐसे कारीगरों का सर्वे किया, साथ ही 2022 से 2023 के बीच मिनिस्ट्री ऑफ टेक्सटाइल के सहयोग से “सामर्थ्य” योजना के तहत इन्हें ट्रेनिंग दिया गया. इसके बाद आर्टिजन कार्ड बनवाया गया, जो बम्बू क्राफ्ट से जुड़े कारीगरों की पहचान है.ट्रेनिंग मिलने के बाद ये कारीगर बांस से लैंप, फूल सज्जा, गिफ्ट बॉक्स जैसे कई आधुनिक उत्पाद बनाने लगे। अब ये लोग गांधी शिल्प मेला और राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित शिल्प मेलों में भी हिस्सा लेने लगे है.

8000 से 10000 रुपये तक की कमाई

पहले पारंपरिक सूप और दउरा बनाकर जहां महीने में सिर्फ 1500 से 2000 रुपये की आमदनी होती थी.वहीं, अब ट्रेनिंग के बाद यह बढ़कर 8000 से 10000 रुपये तक पहुंच गई है. डिजाइन डेवलपमेंट वर्कशॉप के बाद आमदनी में और इजाफा हुआ है.इनमे से कई कारीगर अब मास्टर क्राफ्ट पर्सन और ट्रेनर भी बन चुके है, जो दूसरों को प्रशिक्षण दे रहे है.आलम यह है कि अब दिल्ली, मुंबई और ओडिशा जैसे शहरों में लगने वाले राष्ट्रीय शिल्प मेलों में ये अपने उत्पादों के साथ जाते हैं, जहां उन्हें टीए-डीए की सुविधा भी मिलती है और वे सीधे अपना सामान बेचते है.

रिपोर्ट-नीरज कुमार

Published at:31 Jan 2026 01:05 PM (IST)
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