रांची(RANCHI): देश में समाज के लिए जल जंगल जमीन की लड़ाई खास दशकों पुरानी है. इस लड़ाई के समय समय पर अंदाज बदले. कभी भगवान बिरसा मुंडा ने तीर धनुष के साथ अंग्रेजों के दांत खट्टे किए तो 70 के दशक में गुरुजी ने तीर धनुष से महाजनों के खिलाफ आवाज बुलंद की.लेकिन हर बार महाजनों सुधखोरों के खिलाफ आवाज उठाने पर नक्सली तक बता दिया गया. और दिशोम गुरु शिबू सोरेन को देखते ही गोली मारने का आदेश दिया गया. लेकिन बाद में हर वो ताकत शिबू सोरेन के सामने झुकी. ऐसे आज बात इसी नक्सल पर करेंगे. क्या जंगल जमीन की बात करने वाले को अब भी सरकार नक्सली बोल कर मार रही है.
सबसे पहले बात शिबू सोरेन की कर लेते है. जब धनकटनी आंदोलन की शुरुआत की थी. इस समय शिबू सोरेन का नाम शिव चरण मांझी था. लेकिन प्यार से गाँव के लोगों ने इन्हे शिबू बोलते थे. इस बीच शिबू ने आदिवासियों के साथ मिल कर नेमरा से धनकटनी आंदोलन की शुरुआत की थी. बाद में यह पूरे झारखंड में फैल गया. यह आंदोलन साहूकार और जमींदारों के खिलाफ था. जो आदिवासी की ही जमीन पर कब्जा कर उनसे फसल उगवा कर कटवा लिया करते थे.
लेकिन जब शिबू सोरेन ने आवाज उठाया तो पुलिस को आगे कर इस आंदोलन को कुचलने की कोशिश की गई. एक समय तो ऐसा आया की शिबू सोरेन को मोस्ट वांटेड की लिस्ट में शामिल कर दिया गया और देखते ही गोली मारने का आदेश दे दिया गया. इस ऑर्डर के बाद शिबू सोरेन का ठिकाना लंबे समय तक पारसनाथ के पहाड़ पर हो गया था.
जहां शिबू सोरेन आदिवासियों के साथ बैठक करते थे. कभी संथाल परगना पहुंच जाते. गुरुजी पैदल ही एक जगह से दूसरे जगह निकल जाते. लेकिन इस बीच उन्हे नक्सली बोल कर वांटेड की लिस्ट में शामिल किया गया.
शिबू सोरेन ने यह समझा की अगर अविभाजित बिहार में रह कर पुलिस के खिलाफ महाजनों के खिलाफ आवाज उठायेंगे तो आंदोलन को अंजाम तक नहीं पहुंचाया जा सकता. जिसके बाद उन्होंने अलग राज्य की मांग को तेज कर दिया. उन्हे मालूम था की जब तक झारखंड अलग नहीं होगा. झारखंडी को हक और अधिकार नहीं मिलेगा. उनकी आवाज को कुचल दिया जाएगा. अलग राज्य के आंदोलन को पूर्ण समर्थन मिला , 2000 में केंद्र सरकार झुकी और राज्य अलग कर दिया. गुरु जी के संघर्ष को जीत मिली उनका सपना पूरा हो गया. गुरु जी दो बार मुख्यमंत्री बने, राज्य को बढ़ाने का उन्होंने हर सम्भव प्रयास किया . गुरु जी जुझारू थे लेकिन अंत में शारीरिक परेशानियों से जुझते रहे अंततः उनकी मृत्यु हो गई. आज हेमंत सोरेन के कंधों पर राज्य की जिम्मेदारी है.
झारखंड के इस महानायक की जयंती पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने याद करते हुए बताते हैं कि कैसे झारखंड के लोगों को नक्सली बोला जाता था. यानि अपने हक और अधिकार की बात करने की इन्हें छुट नहीं थी, ये मुद्दा उठा नहीं सकते थे.
गरीब आदिवासी आज भी जब जल जंगल और जमीन की बात उठाते हैं और अधिकार के लिए संघर्ष करते हैं तो इन्हें नक्सली बता दिया जाता है. झारखंड में चल रहे नक्सल अभियान का जिक्र कर लेते है. जंगल में रहने वाले टॉप वांटेड नक्सली में दिशोम गुरु शिबू सोरेन को आदर्श मानने वाले मिसिर बेसरा भी शामिल है. वह भी जल जंगल जमीन की बात करता है.
सबसे बड़ा सवाल आखिर मांडवी हिडमा हो या मिसिर बेसरा ये नक्सली क्यों बन गए? क्या जल जंगल जमीन पर हक की लड़ाई, उन्हें इस मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया! सिर्फ यही दोनों नहीं इनके जैसे सैकड़ों आदिवासी और मूलवासी नक्सली बन जंगल - जंगल भटक रहे हैं. जल - जंगल - जमीन की लड़ाई लड़ते समाज से कट चुके हैं. सस्त्र संघर्ष के वजह से ये पुलिस के टार्गेट पर है, आज इनके खिलाफ लगातार अभियान चलाये जा रहे हैं, आपसी संघर्ष में कभी ये तो कभी पुलिस मारे जाते हैं. नक्सलियों के खात्मे के लिए केंद्र ने डेड लाइन दे रखी है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल, क्या नक्सली हमेशा के लिए मारे जायेगे ! शायद नहीं , क्योंकि जब तक जल जमीन जमीन पर अधिकार की बात होगी और इन्हें इससे बेदखल किया जाएगा तो ये नक्सली बनते रहेंगे.
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