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स्थापना के 40 साल बाद भी विकास की बाट जोहता गुमला: ना शिक्षा ना रोजगार, जंगल से लकड़ी काट पेट पालता आदिवासी समाज

स्थापना के 40 साल बाद भी विकास की बाट जोहता गुमला: ना शिक्षा ना रोजगार, जंगल से लकड़ी काट पेट पालता आदिवासी समाज

गुमला(GUMLA):गुमला जिला की स्थापना का 40 साल से अधिक समय बीत चुका है बावजूद इसके गुमला जिला की ग्रामीण इलाकों की तस्वीर आज तक नहीं बदल पाई है. ग्रामीण इलाकों में लोगों को आज तक मूलभूत सुविधाएं नसीब नहीं हुई.जिसकी वजह से यहां के ग्रामीण अब हताश और निराश होकर जीने को मजबूर हो चुके है. जिला के प्रशासनिक पदाधिकारी हो या फिर राजनेता किसी को गुमला के ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों से और यहां के विकास से कोई लेना देना ही नहीं है.यही वजह है कि आज तक गुमला जिला में ना तो सही से शिक्षा की व्यवस्था हो पाई और ना ही सही रूप से स्वास्थ्य व्यवस्था लोगों को मुहैया हुई. यहां के लोगों का जीवन दयनीय हो चुका है, लेकिन इनकी सुध लेनेवाला कोई नहीं है. 

आज तक लोगों को सड़के तक नसीब नहीं हुई 

गुमला जिला की स्थापना 18 मई 1983 को हुई थी जिसके बाद यह अनुमान लगाया जा रहा था कि अनुमंडल से जिला के रूप में पहचान पाने के बाद अब गुमला जिला में विकास योजनाओं की गति काफी तेज हो जाएगी. दूर दृष्टि ग्रामीण क्षेत्र का विकास काफी तेजी से होगा और लोगों को बेहतर सुविधाएं मिल पाएगी, लेकिन जानकर आपको आश्चर्य होगा 12 प्रखंडों का या बड़ा जिला के राजनीति का केंद्र तो रहा है क्योंकि यहां तीन विधानसभा क्षेत्र है और लोहरदगा लोकसभा क्षेत्र का बहुत बड़ा हिस्सा इस जिले में शामिल है, लेकिन बावजूद इसके यहां से जीत कर जाने वाले राजनेता इस इलाके के विकास को लेकर कभी भी गंभीर नजर नहीं आये.जिसका परिणाम ग्रामीण इलाकों के लोग की स्थिति को देखकर लगाया जा सकता है.यहां के लोगों आज तक मूलभूत सुविधाओं से पूरी तरह से वंचित है. कुछ इलाकों में सड़कों का निर्माण तो किया गया है लेकिन ग्रामीण इलाकों में आज भी स्थिति जज की तस बनी हुई है.   

रघुवर दास के शासन काल में लोगों को विकास की उम्मीद जगी थी 

यदि झारखंड बनने के बाद पूरे कालखंड को ध्यान से देखा जाए तो केवल रघुवर दास  के कार्यकाल को छोड़कर बाकी कालखंड से किस जिले का विकास का कार्य पूरी तरह से शीतल पड़ा हुआ नजर आ रहा था. केवल रघुवर दास  के शासनकाल में किसी इलाके में न केवल विकास योजना में तेजी आई बल्कि इस इलाके को नक्सली की गतिविधियों से पूरी तरह से मुक्ति दिलाने में उसे शासन काल में बेहतर तरीके से कम हुआ, लेकिन आज भी यह जिला कई तरह की मूलभूत सुविधाओं से वंचित नजर आ रहा है. ग्रामीण क्षेत्रों में ना तो शिक्षा की व्यवस्था सही रूप से है और ना ही स्वास्थ्य व्यवस्था सही रूप से देखने को मिलती है, शुद्ध पीने का पानी भी लोगों को नहीं मिल पाता है और आवागमन के लिए सड़कों की व्यवस्था जो हर टोल मोहल्ले के लिए होनी चाहिए, वह अभी आज तक नहीं हो पाई है.   आपको बताये कि गुमला  जिला आदिवासीबहुल जिला होने की वजह से सबसे अधिक केंद्र और राज्य सरकार से राशि तो प्राप्त करता है, लेकिन उसे राशि का क्या होता है इसका भगवान ही मालिक है. जिले में विकास योजनाओं को लेकर लंबी चौड़ी दावे तो किए जाते हैं लेकिन आज तक ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति काफी बदहाल बनी हुई है, कई इलाकों में रहनेवाले आदिम जनजातियों को तो आज तक आने जाने के लिए सही रूप से रास्ते तक भी नसीब नहीं हो पाया  हैं. यहां के ग्रामीणों की शिक्षा स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह से भगवान भरोसे है. कई इलाकों में तो बच्चे आज भी सरकारी स्कूलों से ही पूरी तरह से वंचित है. वहां सरकारी स्कूल भी सही रूप से व्यवस्थित नहीं हो पाया है.लोगों ने स्पष्ट कहा है कि  शहर में तो पूरी तरह से विकास किया गया लेकिन ग्रामीण इलाके के लोंगों को ऐसे ही मरने के लिए छोड़ दिया गया.13 लाख से अधिक आबादी वाला या जिला आज भी विकास योजनाओं से काफी रूप से वंचित है जिसको लेकर लोगों के शब्दों में पूरी तरह से दर्द देखने को मिल रहा है. 

ग्रामीणों की दयनीय स्थिति से अधिकारियों और नेताओं को कोई मतलब नहीं है

 गुमला जिला के ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों का जीवन शैली देखकर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इस इलाके के विकास की स्थिति क्या है. कई इलाकों में तो लोगों को कई किलो मीटर दूर जाकर उन्हें पानी लाना पड़ता है, ऐसे में लोगों को इस बात का एहसास होने लगा है कि शायद राज्य की सरकार उनकी विकास को लेकर कभी गंभीर हुई नहीं है. वहीं जिला प्रशासन की ओर से विकास के जो दावे  किए जाते हैं वह केवल फाइलों तक की सिमट कर रहे हैं. पूरी तरह से विकास की बात जो रहा है गुमला जैसे आदिवासी बोली इलाके में लोगों का जीवन पूरी तरह से कृषि पर आश्रित है, लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि कृषि भी पूरी तरह से मानसून की बारिश पर हो पाती है. बारिश नहीं होने की स्थिति में लोगों की खेती भी पूरी तरह से बर्बाद हो जाती है. ऐसे में लोगों को पलायन करने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है. 

आज भी लोग यहां जंगल की लकड़ी काटकर अपना जीवन यापन करते है 

गुमला जिला झारखंड का एक ऐसा जिला है जहां से काफी संख्या में लोग काम करने के लिए दूसरे राज्यों में जाते हैं, ऐसे में समझ सकते हैं कि यहां से जीत कर जाने वाले राजनेता और पदाधिकारी जो यहां पर काम करते हैं, उनके अंदर यहां के लोगों के प्रति कितनी संवेदना है. वह उनके कार्यशैली से नजर आता है, कई इलाकों में तो स्थिति ऐसी है कि लोगों का जीवन पूरी तरह से जंगलों पर आश्रित होता है या तो वह जंगल की लकड़ी काटकर बेचते हैं या फिर पत्थर बेचकर अपना जीवन चला रहे हैं, लेकिन बावजूद इसके यहां के पदाधिकारी के अंदर यहां के लोगों के प्रति कोई चिंता नहीं है.साल 2024 आ गया लेकिन गुमला जिला को आज तक रेलवे लाइन की सुविधा नहीं मिल पाई. केंद्र में बनने वाली है सरकार ने चुनाव के दौरान यहां रेलवे लाइन का मुद्दा तो उठाया, लेकिन शासन सत्ता में जाने के बाद शायद गुमला उनके दिमाग में कहीं रहा ही नहीं यही वजह  है कि उन्हें यह बात तब याद आई जब दोबारा चुनावी मैदान में आए तो ऐसे में स्पष्ट समझा जा सकता है कि आदिवासियों के नाम पर राजनीति करने वाले झारखंड के जो भी मुख्यमंत्री आदिवासी समुदाय से आते हैं उन्होंने भी आदिवासियों को ठगने का काम किया है. 

 रिपोर्ट-सुशील कुमार  

Published at:18 May 2024 03:41 PM (IST)
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