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कहीं आदर्श गांव बालीजोर की तरह बदहाल तो ना हो जाए घसीपुर, देखिए ये रिपोर्ट

BY -
Purnima
Purnima
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 14, 2026, 9:29:15 AM

दुमका (DUMKA) : राज्यपाल सीपी रामकृष्णन दो दिवसीय दुमका दौरा सम्पन्न कर वापस लौट गए. राज्यपाल के आने का मुख्य कारण था सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय के 7वें दीक्षांत समारोह में शामिल होना था. लेकिन कार्यक्रम से एक दिन पूर्व आने पर जिला प्रशासन द्वारा एक गांव में राज्यपाल का भ्रमण कराया गया. गांव का नाम है घसीपुर मोहली टोला. इस गांव को जिला प्रशासन द्वारा आदर्श गांव के रूप में विकसित किया जा रहा है. 22 मार्च की शाम गांव पहुँच कर राज्यपाल कभी शिक्षक की भूमिका में नजर आए तो कभी अभिभावक की भूमिका में. आंगनबाड़ी और विद्यालय में बच्चों के साथ बातचीत कर शिक्षा के लिए प्रेरित किया तो ग्रामीण महिला के साथ जमीन पर बैठ कर बांस से सामान बनाने की कला सीखा. जिसने भी इस नजारे को देखा राज्यपाल के साथ जिला प्रशासन की तारीफ की.  राज्यपाल को सहज व सरल स्वभाव का धनी करार दिया तो आदर्श गांव के रूप में एक पिछड़े गांव को विकसित करने के लिए जिला प्रशासन की सराहना की. होनी भी चाहिए क्योंकि जब काम अच्छा हो तो बरबस लोग तारीफ कर बैठते है.  

अधिकारी के तबदलता गांव का रूप रेखा बदला

लेकिन जिला प्रशासन द्वारा दुमका जिला में किसी एक गांव को आदर्श गांव के रूप में विकसित करने का प्रयास कोई नया नहीं है. लेकिन अधिकारी के तबदलता होते ही आदर्श गांव की रूप रेखा बदलने लगती है. जिस आदर्श गांव को देख कर अभी हम कहते है कि वाह! क्या गांव है. वही गांव बेदम! आदर्श गांव बन जाता है. शिकारीपाड़ा का बालीजोर आदर्श गांव इसका ज्वलंत उदाहरण है.

पूर्ववर्ती सरकार में बालीजोर गांव था चर्चा में

वर्ष 2018 में दुमका जिला के शिकारीपाड़ा प्रखंड के बालीजोर गांव अचानक सुर्खियों में आ गया था.आदिवासी बाहुल्य बालीजोर गांव को तत्कालीन उपायुक्त मुकेश कुमार ने गोद लिया था. डीसी के गोद लेने की घोषणा के साथ ही गांव को आदर्श गांव के रूप में विकसित करने में पूरा तंत्र लग गया. हड़िया दारू बेच कर जीवकोपार्जन करने वाली महिलाओं को चप्पल निर्माण कार्य से जोड़ा गया. चप्पल बनाने के उपकरण लगाए गए. तत्कालीन सीएम रघुवर दास द्वारा इसका उद्घाटन किया गया. जेएसएलपीएस से जोड़कर महिलाओं को प्रशिक्षण दिया गया. निर्मित उत्पाद को बाली फुटवियर नाम से बाजार में उतारा गया. जिले में संचालित आवासीय विद्यालय को बाली फुटवियर खरीदने का निर्देश मिला. इसके अलावे बाजार से लेकर जिला प्रशासन द्वारा लगाए गए विकास मेला में बाली फुटवियर का स्टॉल लगाया जाने लगा. गांव में बच्चों के खेलने के लिए पार्क बनाया गया.  गली कूची रोड बना. चौक चौराहे पर स्ट्रीट लाइट लगाए गए. हर घर पीएम आवास सहित सरकार की तमाम योजनाओं से ग्रामीणों को जोड़ा गया. ग्रामीण अपने गांव की बदलते तस्वीर देख कर फूले नहीं समाते थे. ग्रामीणों की आर्थिक उन्नति हो रही थी। गांव में हड़िया दारू निर्माण की बात इतिहास बनने वाला था कि अचानक उपायुक्त मुकेश कुमार का तबादला हो गया.

गांव के बिगड़ती हालत का जिम्मेदार कौन

मुकेश कुमार का तबादला होते ही गांव अनाथ हो गया. आज उपकरण धूल फांक रहे है. पार्क में लगे झूले टूट गए. स्ट्रीट लाइट खराब हो गए. गांव के विकास के लिए खर्च हुए रुपए पानी मे बह गया. आज के समय मे बालीजोर गांव को देख कर बेदम! आदर्श गांव कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. अब सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? गांव को संवारने और सूरत बिगड़ने के लिए जिम्मेवार किसे माना जाए. गांव के विकास के नाम पर जनता की गाढ़ी कमाई बर्वाद हुआ इसके लिए दोषी कौन? निःसंदेह अगर गांव को विकसित करने का श्रेय जिला प्रशासन को जाता है तो विकास की राह पर अग्रसर होने के बाबजूद अगर गांव पिछड़ गया तो इसके जिम्मेवार भी प्रसासन को ही माना जायेगा. सरकारी नोकरी में ट्रांसफर या पोस्टिंग एक सतत प्रक्रिया है. कोई भी अधिकारी जब जिले की कमान संभालते है तो कुछ नया करने की सोच उनमें रहती है. जिसके तहत एक गांव को चिन्हित कर उसे मॉडल विलेज के रूप में विकसित किया जाता है. लेकिन उस अधिकारी के जाने के बाद जो नए अधिकारी आते है वो कुछ नया करने की सोच रखते है. नतीजा यह होता है कि पूर्व के अधिकारी द्वारा किया गया कार्य बेपटरी हो जाता है. नए आने वाले अधिकारी अगर पूर्व के अधिकारी द्वारा किये गए कार्य को आगे बढ़ाते हुए कोई नया कार्य करें तो शायद बालीजोर गांव जैसी स्थिति उत्पन्न नहीं होगी.

आदर्श गांव बन सकता है बेदम आदर्श गांव

आज घसीपुर मोहली टोला की चर्चा हर तरफ हो रही है. गांव आगे भी चर्चा में रहेगा क्योंकि गांव के नाम के साथ आदर्श शब्द जुड़ गया है. उम्मीद की जानी चाहिए कि वर्तमान अधिकारी के जाते ही लोग घसीपुर मोहली टोला की चर्चा बालीजोर गांव की तरह ना हो. क्योंकि जब कोई अधिकारी गांव को गोद लेने की घोषणा करते है तो वह घोषणा व्यक्ति विशेष की नहीं होती बल्कि कुर्सी विशेष की होती है और कुर्सी पर बैठने वाले अधिकारी को यह समझना होगा. अन्यथा आदर्श गांव को बेदम आदर्श गांव बनते देर नहीं लगेगी.

रिपोर्ट: पंचम झा 

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