दुमका(DUMKA):दुमका के हिजला में मयूराक्षी नदी के तट पर लगने वाला राजकीय जनजातीय हिजला मेला महोत्सव 2024 का आगाज हो गया. 8 दिनों तक चलने वाले इस मेला का उद्घाटन इस वर्ष भी हिजला के ग्राम प्रधान सुनीलाल हांसदा द्वारा फीता काटकर किया गया.मौके पर एसडीओ, प्रशिक्षु एआईएस सहित कई अधिकारी और सामाजिक संगठन से जुड़े लोग मौजूद रहे. उद्घाटन से पूर्व उल्लास जुलूस निकाला गया, जिसमें काफी संख्या में आदिवासी समाज के लोग परंपरागत परिधान पहनकर पारंपरिक वाद्य यंत्र के साथ शरीक हुए. मेला परिसर पहुंचकर पूज्य स्थल दिसोम मारंग बुरु थान में संताल समाज के लोगों और अधिकारियों द्वारा पूजा अर्चना किया गया.

इस मेला का इतिहास 134 साल पुराना है
इस मेला का इतिहास 134 साल पुराना है.वर्ष 1890 से मयूराक्षी नदी के तट पर हिजला मेला का आयोजन होता आ रहा है. हिजला गांव ग्राम प्रधान सह मेला के उदघटनकर्ता सुनिलाल हांसदा ने कहा कि अगर अग्रेज सरकार वर्षो पूर्व पूज्य पेड़ सारजोम (सखुवा) को नही कटवाते तो शायद यहां मेला शुरू ही नही हुआ होता. दिसोम मंझी थान के नायकी सीताराम सोरेन ने मेला के इतिहास के बारे में बताया कि कई सौ वर्ष पहले यहां संताल आदिवासी का पूज्य पेड़ सारजोम (सखुआ) हुआ करता था। पेड़ के नीचे ग्रामीण एकत्रित होते थे और पूजा अर्चना करते थे। साथ ही गांव में जो फैसला नहीं हो पाता था उसकी सुनवाई यहां होती थी। जिसे मोड़े पिंडह बैसी (पंचायती) भी कहा जाता था।आदिवासियों के अधिक संख्या में यहां जमा होने के कारण ब्रिटिश सरकार को विद्रोह का डर सताने लगा था. अंग्रेज सरकार को पता चला कि यही सारजोम (सखुवा) पेड़ ही इसका बहुत बड़ा कारण है।आदिवासी यहाँ जमा ना हो और विद्रोह नही हो, इसलिए तत्कालीन अंग्रेज सरकार ने उस पूज्य पेड़ को कटवा दिया. किंवदंती है कि पेड़ काटने के बादबइस इलाके में भीषण अकाल पड़ा.इलाके में भुखमरी की स्थिति उत्पन्न होने लगी, जिससे आदिवासी ग्रामीण आक्रोशित होने लगे। इससे अंग्रेजो के विरुद्ध आंदोलन कि आग भड़कने लगी.संभावित आंदोलन को रोकने के उद्देश्य से 1890 में ब्रिटिश सरकार ने यहां मेला लगवाने की परंपरा शुरू किया. आरंभ में यह हिंजला(अपना कानून) के नाम से जाना जाता था. कालांतर में हिंजला का अपभ्रंश हिजला हो गया. जिस पूज्य पेड़ सारजोम (सखुवा) को ब्रिटिश ने कटवा दिया था उसका अवशेष आज फासिल्स में तब्दील हो गया है.जिसे आदिवासी दिसोम मरांग बुरु थान के नाम से जानते है और समाज के लोग उसकी पूजा करते है.

3 फरवरी सन 1890 ई. में इस ऐतिहासिक मेले की नींव रखी गई थी
संताल परगना के तत्कालीन अंग्रेज उपायुक्त जॉन राबटर्स कास्टेयर्स के समय 3 फरवरी सन 1890 ई. में इस ऐतिहासिक मेले की नींव रखी गई थी.स्थानीय परंपरा, रीति-रिवाज और लोगों से सीधा संवाद स्थापित करने के उद्देश्य से मेला की शुरुआत की गई थी. वर्ष 1975 में संताल परगना के तत्कालीन उपायुक्त गोविंद रामचंद्र पटवर्धन की पहल पर हिजला मेला के आगे जनजातीय शब्द जोड़ दिया गया. झारखण्ड सरकार ने इस मेला को वर्ष 2008 से एक महोत्सव के रुप में मनाने का निर्णय लिया.2015 में इस मेला को राजकीय मेला का दर्जा प्रदान किया गया, जिसके पश्चात यह मेला राजकीय जनजातीय हिजला मेला महोत्सव के नाम से जाना जाता है.अमूमन किसी राजकीय महोत्सव या मेले के लिए आमंत्रण मिलने पर मंत्री, नेता और पदाधिकारी अतिथि बनने या फीता काटने के लिए तैयार रहते हैं.तीन दशक पहले तक राज्यपाल और मुख्यमंत्री इस मेले का उदघाटन समारोह में शामिल हुआ करते थे. लेकिन मेले के उद्घाटन के बाद राजनेताओंकी कुर्सी हाथ से निकल जाने पर कई तरह की भ्रांतियां बन गई. जिसके कारण अब राजनेता और अधिकारी इस मेले का फीटा काटने से कतराते हैं.मेले का अब उदघाटन ग्राम प्रधान के हाथों होता हैं.

मेले में जनजातीय संस्कृति, नृत्य-संगीत का प्रदर्शन होता है
हिजला मेला विविधता से भरपूर है.जहां एक ओर जनजातीय संस्कृति, नृत्य-संगीत का प्रदर्शन होता है.वहीं दूसरी ओर भीतरी कला मंच पर दिन भर बच्चों का क्विज, भाषण, वाद-विवाद प्रतियोगिता और बुद्धिजीवियों के मध्य परिचर्चा का आयोजन किया जाता है. इसके अलावा रात में कॉलेज विद्यार्थियों की ओर से पारंपारिक कथानकों का मंचन किया जाता है, साथ ही बाहरी कला मंच पर सांस्कृतिक दलों के मध्य प्रतियोगिता और सांस्कृतिक संध्या जिसमे राष्ट्रीय अंतराष्ट्रीय स्तर के कलाकारों का प्रदर्शन, खेल-कूद प्रतियोगिता के साथ-साथ पुस्तक, खानपान और मनोरंजन और संबंधित दुकाने लगाई जाती है.सरकार की विभिन्न योजनाओं से रुबरु कराने के उद्देश्य से विभागों द्वारा स्टॉल लगाए गए हैं, तो किसानों को आधुनिक तकनीक से अवगत कराने के लिए कृषि, आत्मा, उद्यान और मत्स्य पदाधिकारीयों की ओर से कराया जाता है.कृषि प्रदर्शनी लोगों के आकर्षण का केंद्र बिंदु है. कुछ वर्षों से शुरू जनजातीय फैशन शो मुख्य आकर्षण बनता जा रहा है.कुल मिलाकर कहें तो दुमका ही नहीं झारखंड की इस ऐतिहासिक मेला में चारो तरफ आदिवासी संस्कृति की झलक देखने को मिलती है, जिसका इंतजार लोगों को वर्ष भर रहता है.
रिपोर्ट-पंचम झा
