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वर्दी-ए-इंसाफ की फिर उठी मांग: सहायक पुलिसकर्मियों की लड़ाई अब मानदेय से भविष्य और अस्तित्व तक

BY -
Shreya Upadhyay  CE
Shreya Upadhyay CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 12, 2026, 5:18:51 AM

रांची(RANCHI): झारखंड में अगर आप सरकारी नौकरी की कोशिश कर रहे है तब भी और अगर सरकारी नौकरी कर रहे है तब भी, राज्य की चरमराई व्यवस्था का शिकार हो सकते है. फिर बात चाहे प्रतियोगी परीक्षाओं की हो या राज्य के सहायक पुलिस की. अब हाल की ही बात है जब सहायक पुलिस अपनी मांगों को लेकर धरने पर बैठे थे. पर विचार करने वाली बात ये है की आखिर अपनी जान हथेली पर रख कर काम करने वालों के लिए मानदेय के नाम पर 10 से 12 हजार में कैसे अपने घर-परिवार को पाल सकता है, कैसे अपने बच्चों को अच्छे भले स्कूल में पढ़ा सकते है, और कैसे एक बेहतर कल की कल्पना कर सकते हैं. 

पर फिलहाल एक और चिंता इन सहायक पुलिस को सता रही है. दरअसल इसी साल, कुछ ही महीनों बाद सहायक पुलिस का सेवा विस्तार समाप्त होने वाला है. ऐसे में झारखंड सरकार द्वारा इस दौरान न तो कोई भर्ती निकली गई है नाहीं अबतक इन जवानों को कहीं समायोजित करने का कोई रास्ता नजर आ रहा है. ऐसे में अगर इन सहायक पुलिस को समय रहते समायोजित या अन्य किसी भर्ती के तहत नही रखा जाएगा तो यह लोग बेरोजगार होने को मजबूर हो जाएंगे.

बता दें की साल 2017 में झारखंड के 12 नक्सल बहुल जिलों में करीबन 2,500 से अधिक सहायक पुलिसकर्मियों की भर्ती हुई थी. इन्हें हर महीने मानदेय के नाम पर 10,000 रुपये के साथ तीन साल के कॉन्ट्रैक्ट पर रखा गया था. उस समय राज्य में बीजेपी की सरकार थी और रघुवर दास मुख्यमंत्री थे. उन्होंने वादा किया था कि जो सहायक पुलिसकर्मी अपनी ड्यूटी ईमानदारी से निभाएंगे, उन्हें तीन साल बाद स्थायी सिपाही की नौकरी दी जाएगी. लेकिन सरकार बदली और यह वादा पूरा नहीं हो सका. और तो और साल 2019 और साल 2021 में सहायक पुलिस की सेवाएं बंद कर दी गई थीं, जिन्हें बाद में आंदोलन के बाद फिर से शुरू किया गया. ऐसे में अब इनकी संख्या घटकर करीब 2200 रह गई है.

बता दें कि साल 2020 में उन्हें नौकरी स्थायी होने का आश्वासन भी मिला था, जिसके बाद 2021 में लिखित आश्वासन दिया गया. वहीं साल 2024, अपना घर-बार छोड़कर सहायक पुलिसकर्मी एक बार फिर सड़क पर आने को मजबूर हुए. पिछले साल सहायक पुलिस ने सिर्फ सीएम आवास, राजभवन ही नहीं बल्कि विधानसभा तक को घेरने का काम किया था. आंदोलन इतना बढ़ गया था कि धरने के दौरान 'वर्दी की लड़ाई' भी देखने को मिली थी, जब ये लोग मुख्यमंत्री आवास की ओर कूच कर रहे थे. तब आंदोलन के दौरान वाटर कैनन की तेज दर, टियर गैस और लाठीचार्ज जैसी घटनाएं भी हुईं. लेकिन इतने कादे परिश्रम के बाद अंततः झारखंड सरकार द्वारा सहायक पुलिसकर्मियों के वेतनमान में 2,000 रुपये की वृद्धि की गई. 

लगातार वेतन वृद्धि और अन्य मांगों को लेकर धरना करने वाले सहायक पुलिस अब नौकरी की गुहार लगाने को मजबूर हो गए है. ऐसे में अब देखने वाली बात बात होगी की अपनी नौकरी को बचाने के लिए सहायक पुलिस कौनसा कदम उठाते है.

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