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बाबरी की तरह अब मरांगबुरु को दहलाने की साजिश, साजिश या सियासत! अचानक क्यों मुखर हो रहे हैं आदिवासी नेता?  जानिये इसके पीछे की कहानी

BY -
Prakash Tiwary
Prakash Tiwary
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 17, 2026, 4:18:30 AM

रांची(RANCHI): सम्मेद शिखऱ पर्वत बनाम मरांगबुरु की लड़ाई को एक और कदम आगे बढ़ाते हुए पूर्व भाजपा सांसद सालखन मुर्मू ने जैनियों के पवित्र धर्मस्थल सम्मेद शिखर को बाबरी मस्जिद का हाल करने की खुली धमकी दी है. उन्होंने कहा है कि सरकार हमारे धैर्य की परीक्षा नहीं ले, क्योंकि आदिवासी समाज का धैर्य टूटा तो सम्मेद शिखर का भी वही हाल होगा, जो बाबरी मस्जिद का हुआ था.

सम्मेद शिखर को जैनियों का पवित्र स्थल बता कर हेमंत सोरेन ने आदिवासियों का अपमान किया

राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को निशाने पर लेते हुए सालखन मुर्मू ने कहा कि सम्मेद शिखर को जैनियों का पवित्र स्थल बता कर हेमंत सोरेन ने आदिवासियों की संस्कृति और प्रथा का तिरस्कार किया है, हमारी भावनाओं को खुली चुनौती दी है, आदिवासी समुदाय पीढ़ियों से इस पर्वत को पूजता रहा है, वहां बलि देता रहा है. लाल मुर्गा चढ़ाता रहा है.

पहाड़, नदी, झरना और जंगल हमारी पहचान, हम इसे दूसरे को कैसे सौंप सकते हैं?

पहाड़, नदी, झरना और जंगल यही तो हमारी पहचान है. हम इसे किसी दूसरे धर्मावलम्बी को कैसे सौंप सकते हैं? हेमंत सोरेन ने खुलेआम इसे जैनियों का पवित्र स्थल बताया है, तब उन्हे यह भी बताना चाहिए कि हमारे मरांगबुरु का क्या होगा? क्या हम मरांगबुरु को जैनियों को सौंप दें? क्या आदिवासियों की प्रथा, संस्कृति और धार्मिक स्थलों का कोई महत्व नहीं है? क्या हम अपने ही घर में बेगाने हो जाए? और अपने धरोहर और धार्मिक स्थल को जैनियों को सौंप दें? आखिर वह किसकी राजनीति करना चाह रहे हैं?

11 फरवरी को रेल चक्का जाम कार्यक्रम की घोषणा

इस मामले में आगे की रणनीति बताते हुए सालखन मुर्मू ने कहा कि 11 फरवरी को झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा में रेल चक्का जाम कर सरकार तक अपनी आवाज पहुंचायी जायेगी. यदि इसके बाद भी सरकार आदिवासी समुदाय की मांग को नहीं मानती है तो 11 अप्रैल से पूरे देश में उग्र आन्दोलन की शुरुआत होगी.

सम्मेद शिखर का वही हाल होगा जो बाबरी मस्जिद का हुआ था

इस लड़ाई को अंजाम तक पहुंचाने के ब्लू प्रिंट का खुलासा करते हुए पूर्व भाजपा सांसद सालखान मुर्मू ने कहा कि जिस प्रकार बाबरी मस्जिद और राम मंदिर को लेकर पूरे देश में हिन्दुओं के द्वारा आन्दोलन चलाया गया था, आदिवासी समुदाय भी पारसनाथ को लेकर अपनी लड़ाई लड़ेगा और सम्मेद शिखर का भी वही हाल होगा जो बाबरी मस्जिद का हुआ था.

लोबिन हेम्ब्रम हजारों आदिवासियों के साथ  21 और 22 फरवरी को मरांग बुरु करेंगे पूजा

यहां याद दिला दें कि इस मामले में झामुमो विधायक लोबिन हेम्ब्रम लम्बे अर्से से अपनी ही सरकार को घेरते रहे हैं, उनके द्वारा 21 और 22 फरवरी को मरांग बुरु की पूजा की घोषणा की गयी है, उनका दावा है कि उस दिन झारखंड, बिहार ,छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के हजारों की आदिवासियों का जुटान होगा. मरांग बुरु पर पहले ही तरह बलि और मदिरा चढ़ाया जायेगा. हम किसी भी कीमत पर मरांग बुरु को जैनियों को नहीं सौंपेंगे.

यहां यह भी याद दिला दे कि लोबिन हेम्ब्रम के द्वारा जैन धर्मालम्बियों को लेकर अभद्र टिप्पणी भी की गयी थी. जैनियों को निवस्त्र रहने पर आपत्ति की गयी थी. लोबिन हेम्ब्रम ने कहा कि था कि कोई हमारी महिलाओं के सामने निवस्त्र कैसे आ सकता है, हमारी भी कुछ  मान्यता है, हम इसके साथ खिलवाड़ कैसे होने दें?

झारखंड में सबसे बड़ा आदिवासी नेता बनने की लगी होड़

यहां बता दें कि ये सारे बयान आकस्मिक नहीं है. यह पूरी रणनीति का हिस्सा है, दरअसल हेमंत सोरेन के द्वारा आदिवासी-मूलवासी कार्ड खेलते ही पूरे राज्य में आदिवासी नेताओं के बीच अपने को सबसे बड़ा आदिवासी-मूलवासी चेहरा साबित करने की होड़ लग चुकी है, एक से एक बड़ा और विवादित बयान देकर एक दूसरे को पीछे करने की रणनीति बनायी जा रही है. यह बयान भी उसी का हिस्सा है.

लोबिन हेम्ब्रम इस बहाने अपनी ही सरकार को घेर कर अपने को आदिवासियों का सबसे बड़ा हितैषी साबित कर रहे हैं, तो दूसरी ओर हाल के दिनों में राजनीतिक बियावान में भटक रहे पूर्व भाजपा सांसद सालखन मुर्मू इसे बाबरी का हाल करने की धमकी देकर आदिवासी समाज में अपनी जमीन तैयार कर रहे हैं.

वहीं इस मामले में झारखंड की राजनीति में अचानक धूमकेतु की तरह सामने आये जयराम महतो भी इसे अपनी राजनीति का मुद्दा बना चुके हैं. जयराम महतो बार बार यह सवाल उठा रहे  हैं कि इस मरांगबुरु पर्वत पर कितने अवैध मंदिरों का  निर्माण हुआ है इसकी जांच होनी चाहिए, आखिर वन विभाग की जमीन पर किसके आदेश से मंदिर निर्माण की अनुमति दी गई, इन मंदिरों के निर्माण में सीएनटी और दूसरी धाराओं का उल्लंघन क्यों किया गया?  साफ है कि जयराम महतो भी इसमें अपना अवसर देख रहे हैं. सबकी कोशिश इस मुद्दे पर अपने चहेरे को आदिवासियों-मूलवासियों का सबसे बड़ा चेहरा साबित करने की है. नहीं तो, सदियों से यहां जैन धर्मालम्बियों और आदिवासी समाज के द्वारा साथ-साथ पूजा अर्चना की जाती रही है, कभी भी इस रुप में यह विवाद सामने नहीं आया. जैन धर्मालम्बी पूजा भी करते रहें और आदिवासियों की ओर से बलि और मदिरा भी चढ़ाया जाता रहा, किसी ने दूसरे की भावना को आधात नहीं पहुंचाया.

रिपोर्ट: देवेन्द्र कुमार

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