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लाल आतंक का आखरी किला फतह करना सबसे बड़ी चुनौती, नक्सली कमांडर मिसिर बेसरा की रणनीति क्या है

BY -
Samir Hussain
Samir Hussain
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: May 16, 2026, 12:42:50 PM

रांची(RANCHI): झारखंड में नक्सलियों के खिलाफ सारंडा में एक अघोषित युद्ध जैसा माहौल है. एक तरफ सुरक्षा बल के जवानों तगड़ी घेराबंदी है तो दूसरी तरफ जंगल में माओवादियों का बारूदी जाल है.पिछले कुछ साल से इस जंगल में गोलियों की गूंज और धमाके की आवाज सुनाई देती है. दर्जनों मुठभेड़ हुई. कई नक्सली मारे गए तो कई जवानों की शहादत हुई. इन सब के बीच गाँव के लोगों ने भी अपनी जान गवाई है. इतना ही नहीं जंगली जानवर भी बारूदी जाल के शिकार होते है. ऐसे में इस रिपोर्ट में नक्सलियों के आखरी किला सारंडा की बात करेंगे. 

जवानों ने बड़ी चोट पहुंचाई 

सबसे पहले बता दे कि सारंडा में CRPF,कोबरा,झारखंड जगुआर और जिला पुलिस के करीब दो हजार जवान नक्सल अभियान में लगे है. इस टीम में शामिल जवान हर दिन नक्सलियों की तलाश में निकलते है. कई बार सुरक्षा बल के जवान और नक्सलियों का आमना सामना भी हुआ. जिसमें सुरक्षा बल के जवानों ने बड़ी चोट माओवादियों को पहुंचाई है. लेकिन इसके बावजूद हर बार कुख्यात मिसिर बेसरा बच कर निकल जाता है. 

बारूदी जाल से बच रहे नक्सली 

इसके पीछे की कई वजह मानी जाती है. सारंडा के जंगल में सुरक्षा बल के जवान को हर कदम सोच समझ कर रखना पड़ता है. जबकि माओवादी इस जंगल में लगाए गए IED से वाकिफ है. उन्हे यह जानकारी होती है कि किस इलाके में कितने आगे बारूदी जाल बिछाये गए है. वह अपने लाइन को क्रॉस नहीं करते है. जबकि सुरक्षा बल के जवान अभियान के दौरान कई बार उस बारूद पर पैर रख देते है. जिससे कई बार नुकसान उठाना पड़ा है. जिसका फायदा माओवादी को सीधे तौर पर मिलता है. 

IED को ढाल बना कर भाग निकलता है कुख्यात माओवादी 

ब्लास्ट के बाद जहां सुरक्षा बल के जवान अपने साथी को निकालने के लिए अभियान को धीमा करते है. और इसी का फायदा उठा कर माओवादी उस इलाके के भाग खड़े होते है. बीते दिनों भी मुठभेड़ में कई ऐसी खबरे सामने आई. जिसमें सुरक्षा बल के जवान और नक्सलियों का आमना सामना हुआ. खबर निकल कर सामने आई की मिसिर बेसरा का दस्ता घीर गया. लेकिन जब मुठभेड़ खत्म हुई तो बेसरा कही भी दिखा नहीं. 

सुरक्षा बल के टारगेट पर बेसरा 

माना जाता है कि मिसिर बेसरा देश का सबसे बड़ा माओवादियों का रणनीतिकार है. यही वजह है कि छत्तीसगढ़ के बस्तर में माओवादियों का खत्मा हुआ. झारखंड का बूढ़ा पहाड़ नक्सल मुक्त हो गया. लेकिन जिस जगह पर मिसिर बेसरा बैठा है उस इलाके में बीते चार साल से अधिक समय से अभियान चल रहा है. कई माओवादी तो मारे गए. लेकिन सुरक्षा बल के जवानों का जो सीधा टारगेट है वह हर बार बच निकलता है. 

हर कदम पर अभियान की कीमत चुकाते है जवान 

इस अभियान में सुरक्षा बल के जवानों के सामने चुनौती सिर्फ बारूद नहीं है. बल्कि यहां जंगल में जहरीले सांप और जंगली जानवर भी है. इस अभियान में सुरक्षा बल के जवान की शहादत सांप काटने से भी हो चुकी है. साथ ही जंगल में रहने वाले जवानों को मलेरिया का भी खतरा रहता है. इसके अलावा कई बार मधू मक्खी का भी हमला देखा गया है. यानि कई चुनौती का सामना जवान अभियान के दौरान कर रहे है. इसके बावजूद अपने मिशन पर डटे है.        
CRPF की अपील-सरेंडर करें 

इस पूरे अभियान पर CRPF आईजी साकेत कुमार सिंह का मानना है कि कोई भी अभियान सामान्य या आसान नहीं होता है. सभी में चुनौती होती है. सारंडा में भी जल्द ही नक्सलियों का सफाया होगा. उन्होंने अपील भी की है. अब सशस्त्र आंदोलन के हालत नहीं है. सभी माओवादी मुख्य धारा में लौट गए है. बाकी बचे हुआ नक्सली भी नई शुरुआत करें. सरकार की आत्म समर्पण और पूर्णवास नीती का फायदा लेकर नए जीवन की शुरुआत करें.  
मिसिर बेसरा के साथ 35 नक्सली 

फिलहाल सारंडा के जंगल में एक करोड़ के इनामी मिसिर बेसरा के साथ सेंट्रल कमिटी सदस्य असीम मण्डल,और 35 के करीब नक्सली हथियार लेकर बचे है. जिसका इलाका छोटा नागर तक ही सीमित है. पुलिस का दावा है कि आने वाले दिनों में इस इलाके से भी माओवादियों का खात्मा हो जाएगा. 

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