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बदलती होली-ए बनवारी तोहर सोने के केवाड़ी, दूगो गोइठा देत, अब नहीं सुनाई देती ऐसी आवाज़ 

BY -
Shreya Gupta
Shreya Gupta
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 15, 2026, 6:37:18 PM

धनबाद(DHANBAD) : ए बनवारी तोहर सोने के केवाड़ी ,दूगो गोइठा देत, गोइठा नइखे, लकड़ी दऽ, लकड़ी नइखे पइसा देत", ए चाची तोहर सोने के केवाड़ी, दूगो गोइठा द ,  इस तरह के नारे,गाने  या स्लोगन के साथ युवकों का झुण्ड अब नहीं दिखता. गोइठा अब मांगा भी नहीं जाता है. खासकर कोयलांचल में तो बिल्कुल ही नहीं. सोमवार को कोयलांचल में अगजा  जलाया गया. पहले जगह-जगह जलाया जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं होता है. होली में काफी बदलाव आ गया है. हुड़दंग भी अब नहीं होता ,राख उड़ाने की परंपरा खत्म हो गई है.  

बहुत काम सुनाई देते ढोलक - झाल के आवाज़ 

कादो-कीचड़ से भी लोग  परहेज करते है. पहले ढोलक ,झाल लेकर लोग होली के पहले से ही निकलने लगते  थे लेकिन अब ऐसा कहीं कुछ दिखता नहीं है. पारंपरिक होली गीतों की जगह फूहड़  गीत बज रहे है.  हां, इतना जरूर हुआ है कि पहले जहां समूह में लोग मोहल्ले में निकल कर लोगों के दरवाजे तक पहुंचते थे, वहां अब हर चौक -चौराहे पर डीजे बजते है. अबीर के बोले खोले जाते हैं, रंग भी डाले जाते हैं, डीजे की धुन पर युवक नाचते- गाते तो जरूर दिखते है लेकिन वह जोश में अधिक और होश में कम होते है. वैसे पहले होली के दिन लोग भांग का सेवन अधिक करते थे, उस भांग की  जगह  लोग शराब पीने लगे है. शराब की बिक्री भी खासकर कोयलांचल में 5 गुना से भी अधिक होली के दिन बढ़ जाती है. फिलहाल एक आंकड़े के मुताबिक धनबाद इस होली में 3. 50  करोड़ की शराब पीएगा, वैसे नॉनवेज खाने की भी पुरानी परंपरा है, इस बार तो बर्ड फ्लू के कारण लोग मुर्गे से परहेज कर रहे है. 

मुर्गा नहीं बकरे की मांस का डिमांड अधिक 
 
बकरा मांस की मांग अधिक है, कारोबारी भी इसका लाभ उठाने से पीछे नहीं  है. यूपी के जिलों से कोयलांचल में बकरे  मंगाए गए है. बकरे के मांस की कीमत में भी इजाफा कर देने की खबर है.  वैसे, होली मिलन समारोह पहले भी होते थे लेकिन इस बार रफ़्तार कुछ अधिक है. 2 साल कोरोना  के कारण लोग रिस्ट्रिक्टेड होली  खेल सके थे. लेकिन इस बार प्रतिबंध फ्री होने के कारण लोगों का उत्साह कुछ अधिक है. बुजुर्ग  लोग बताते हैं कि होली का स्वरूप बदल गया है. इसके कई वजह भी है.  लोग यह भी कहते हैं कि फ्लैट कल्चर होने के कारण लोग अब अपने को उतनी ही दूर में सीमित कर लिए है. अधिकांश लोगों के बच्चे बाहर पढ़ते हैं, वह पर्व त्यौहार में घर आते हैं तो मित्र मंडली नहीं होने के कारण भी वह पुरानी परंपराओं का निर्वहन नहीं कर पाते.

रिपोर्ट : सत्यभूषण सिंह, धनबाद

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