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मौत के बाद ठीक से चिता भी नहीं हो रही नसीब, जानिये झारखंड-ओडिशा सीमा की व्यथा

BY -
Shreya Gupta
Shreya Gupta
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 13, 2026, 7:49:21 AM

चाईबासा (CHAIBASA):  परंपरा रही है कि जीते-जी भले लोग एक-दूसरे से न मिलते-जुलते हों. सम्मान-आदर न करते हों. लेकिन उसकी मौत के बाद सारे-गिले शिकवे भुला दिये जाते हैं. सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किये जाते हैं. लेकिन झारखंड-ओडिशा सीमावर्ती क्षेत्र में मौत के बाद भी सम्मान मिलना मुश्किल है. दरअसल आज तक शवदाह गृह का निर्माण नहीं हो पाया है.

इससे संबंधित खबर उजागर होने के बाद स्पेशल ब्रांच के अधिकारियों ने संज्ञान लेना प्रारंभ कर दिया है. किरीबुरू पश्चिम पंचायत की मुखिया पार्वती किड़ो को फोन कर पूरे मामले और स्थिति की जानकारी ली है. इसके बाद मुखिया पार्वती ने ओडिशा के बोलानी पंचायत के सरपंच मुगा मुंडा को भी बुलाकर उक्त अधिकारी से बात कर मामले से अवगत करवाया. अधिकारियों ने पार्वती किड़ो और मुगा मुंडा को बताया कि यह रिपोर्ट उपायुक्त के पास भेजी जायेगी, जिसके बाद वह ओडिशा प्रशासन से भी बात करेंगे. वे दोनों राज्यों के प्रशासन के संयुक्त प्रयास से इस समस्या का समाधान कराने की कोशिश करेंगे.

भारी वर्षा के बीच शव को जलाने पर मजबूर हैं ग्रामीण

उल्लेखनीय है कि सारंडा वन क्षेत्र स्थित सेल नगरी से प्रसिद्ध किरीबुरू, मेघाहातुबुरु शहर और ग्रामीण क्षेत्र के अलावा ओडिशा के क्योंझर जिला के बेसकैंप, हिल्टॉप, पचरी, लोसर्दा आदि गांवों के लिए शवदाह गृह नहीं है. लगभग 30 हजार की आबादी में सभी धर्म व समुदाय के लोग रहते हैं. हालांकि मुस्लिम, ईसाई, आदिवासी जैसे कुछ समुदाय के लोग अपने परिजनों के मृत शरीर को अपने-अपने कब्रिस्तान में दफनाते हैं. लेकिन दोनों सीमावर्ती राज्यों के हिंदू, सिख आदि समुदाय के लोग शवों के अंतिम संस्कार के लिए झारखंड सीमा के किरीबुरू शहर से सटे ओडिशा के पचरी गांव के समीप स्थित कारो नदी तट किनारे श्मशान घाट जाते हैं. ऐसी स्थिति में बरसात के मौसम में लोगों को सबसे ज्यादा परेशानी उठानी पड़ती है. क्योंकि इस श्मशान घाट पर शव जलाने या शव यात्रा में शामिल लोगों के छुपने के लिए कोई शेड नहीं है. भारी वर्षा के बीच शव जलाना मुश्किल हो जाता है. कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि नदी का जल स्तर अचानक बढ़ जाने व पानी का तेज बहाव में अधजला शव नदी में बह जाता है. इससे अधजला शव पास के गांवों के समीप नदी किनारे झाड़ियों में फंस जाता है.

होता रहा है विवाद

पारंपरिक हथियारों से लैस सैकड़ों ग्रामीणों ने एक बार कारो श्मशान घाट पर किरीबुरू-मेघाहातुबुरु के लोगों को शव जलाने से मना कर दिया था. हालांकि उस समय जिला प्रशासन के आदेश पर किरीबुरू के तत्कालीन इन्स्पेक्टर शिवपूजन बहेलिया, मुखिया पार्वती किड़ो ने ओडिशा के बोलानी पंचायत के तत्कालीन सरपंच से बातकर इस समस्या का अस्थायी समाधान किया था. इसके बाद तो कोई विवाद नहीं हुआ है, लेकिन आज तक कारो श्मशान घाट पर बरसात में शव जलाने के लिए कोई शेड आदि का निर्माण नहीं हो पाया है. संभवतः इसी समस्या की समाधान की कोशिश प्रारंभ की गई है.

रिपोर्ट: संदीप गुप्ता, चाईबासा

 

 

 

 

 

Tags:News

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