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रोचक : सात समंदर पार कर झारखंड पहुंचे परिंदे, देखिए इनकी चहचहाहट से कैसे गुलजार हुई सूबे की फिजा

BY -
Samiksha Singh
Samiksha Singh
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 14, 2026, 7:03:28 AM

Tnp desk:- सर्दी के इस कनकनाती ठंड में खिली-खिली धूप का आनंद तो सभी उठाना चाहते हैं. पेड़,पौधे और जंगलों से घिरे झारखंड में ठंड का अच्छा खासा असर भी देखने को मिलता है. इस दौरान यहां नदी,झीलों और जलाशयों में हजारों मिलों का आसमनी सफर तय करके विदेशी परिंदें भी आते है. इन मेहमानों को देखने के लिए जगह-जगह सैलानियों की भीड़ भी उमड़ पड़ती है. राज्य के आमूमन कई ऐसे जलाशय हैं, जहां साइबेरियन पंछियों की चहचहाट से गुलजार रहता है. पानी में इनकी अठखेलियों को देखकर मन बाग-बाग हो जाता है. इनकी खूबसूरती और हरकते हर किसी को खुश कर देती है.  

आसमान में हजारों किलोमीटर का सफर

साइबेरियन पंछी झारखंड के जलाशयों तक पहुंचने के लिए आसमान में 3 से 4 हजार किलोमीटर का लंबा सफर तय करते हैं. इन विदेशी परिंदों की खासियत है कि कभी ये रास्ता नहीं भटकते, बल्कि अपनी यादाश्त की बदौलत महीनों सफर कर अपनी मंजिल पहुंचते हैं. इस दौरान कई देशों की यात्रा करते हैं, साइबेरियन पंछी अफगानिस्तान, पाकिस्तान और गुजरात होकर झारखंड पहुंचते हैं. इनकी कई प्रजातियों जिनमे कामन पोचार्ड, आरसीपी, रुडी शेल्डक, रु-शी, रु-शेल और गर्गोनी पक्षी शामिल है.

झारखंड क्यों आते हैं साइबेरियन पंछी

दूसरे देश आने के पीछे इन पंछियों की मजबूरी होती है. क्योंकि साइबेरिया में जाड़े में माइनस डिग्री तापमान पहुंच जाता है. जिसके चलते नदी-नाले औऱ जलाशय जम जाते हैं. ऐसे में इनके सामने खाने-पीने का संकट गहरा जाता है. ऐसे हालात से निपटने के लिए दूसरे देशों में भोजन की तलाश में जाते हैं. साइबेरियन पंछी शाकाहारी होते हैं, जिसके चलते मछली या फिर अन्य पानी के जीव को नहीं खाते. ये पंछी दिन भर में दो बार भोजन करते हैं. अमूमन पानी के अंदर के जलीय पौधा इनकी खुराक. इनके बारे बोला जाता है कि हजारों किलोमीटर का लंबा सफर तय करने के लिए दो तीन महीने भरपेट भोजन खाकर खुद को तंदुरुस्त करते हैं. इसके बाद लंबी उड़ान भरते हैं ताकि एनर्जी की कमी न हो औऱ परदेश आसानी से पहुंच सके.

राज्य के कई जलाशयों में लेते पनाह

भोजन की जुगाड़ में हजारों मील का सफर करने वाले साइबेरियन पंछी झारखंड के हर जिलों में मौजूद जलाशयों में अपनी पनाह लेते हैं. प्रदेश के कई नदियों, डैम में इनकी बानगी दिख जाती है. राजधानी रांची की बात करे तो बड़ा तलाब,पतरातू, जोन्हा के हपतबेड़ा, राघु नदी, कोयनारडीह, बोड़ेया में इनका बसेरा दिख जाता है. वही कोयलांचल धनबाद के मशहूर मेथन औऱ तोपचांची झील में सालान इनका प्रवास रहता है. इधर हजारीबाग जिले में इन विदेशी मेहमानों का डेरा छड़वा डैम, गोंडा डैम औऱ तिलैया डैम में रहता है. बोकारों जिले के कोनार और तेनु डैम में भी काफी संख्या में साइबेरियन पछी कलरव करते नजर आते हैं. यहां इनके देखने के लिए काफी संख्या में सैलानियों की भीड़ भी उमड़ती है. इन जिलों के अलावा गिरिडीह, पाकड़ु, रामगढ़, जमशेदपुर, दुमका, देवघऱ में मौजूद जलाशयों में भी साइबेरियन पंछियों का डेरा जमता है. जो सर्दी के खत्म होते ही, आमूमन मार्च तक लौट जाते हैं..

इन पंछियो को किसी भी तरह का खतरा या फिर कोई शिकार न करें, इसे लेकर झारखंड में वन विभाग लगातार निगरानी करता है. इनके संरक्षण के लिए गश्ती दल सभी इलाकों में लगातार घूमता रहता है. इन पंछियों के शिकार पर पाबंदी है. इस फरमान के चलते भी इन परिंदों का संरक्षण होता है.

रिपोर्ट- शिवपूजन सिंह 

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