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हिमाचल में पाकुड़ के मजदूरों से बड़ा धोखा,  ठेकेदारों ने काम कराकर नहीं दिया पैसा, अब प्रशासन से लगा रहे गुहार

हिमाचल में पाकुड़ के मजदूरों से बड़ा धोखा,  ठेकेदारों ने काम कराकर नहीं दिया पैसा, अब प्रशासन से लगा रहे गुहार

पाकुड़ (PAKUR):  झारखंड के सुदूर वनांचल से निकले 18 पहाड़िया युवक, उम्मीदों की गठरी बांधकर हिमाचल की ओर निकले थे. दिल में एक ही सपना था — घर वालों के लिए रोटी का भरोसा, बच्चों के लिए किताबें, और बूढ़े मां-बाप के लिए दवा की कुछ राहत. लेकिन जब लौटे, तो सिर्फ थकान थी, खाली जेबें थीं, और आंखों में आँसू जो रुकते नहीं.

पाकुड़ जिले के अमड़ापाड़ा थाना क्षेत्र के इन आदिम जनजातीय युवकों के साथ जो हुआ, वो केवल आर्थिक शोषण नहीं, बल्कि इंसानियत पर धब्बा है. नवंबर 2024 में दो बिचौलियों के झूठे वादों पर भरोसा करके ये युवक हिमाचल प्रदेश सड़क निर्माण में मजदूरी करने गए. वादा था – हर महीने 17 हजार रुपये, लेकिन हकीकत यह रही कि पांच महीने की कड़ी मेहनत के बदले एक पैसा भी नहीं मिला. उनके हिस्से आया बस रूखा-सूखा खाना, अपमान, और बेबसी.

काम कराया, पैसा नहीं दिया… और हमारा एटीएम भी छीन लिया…यह सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि उस जुल्म की चीख है जिसे इन युवकों ने झेला. पांच महीने तक सूरज की तपिश हो या बर्फ की ठंडक, इन हाथों ने बिना रुके काम किया, सड़कें बनाईं और बदले में मिला धोखा. जब काम पूरा हुआ और मजदूरी मांगी, तो जवाब मिला पैसे नहीं मिलेंगे. इतना भी पैसा नहीं था कि ये अपने गांव लौट सकें. किसी तरह उधारी और मदद से ये युवक घर पहुंचे —टूटे हुए, शर्मसार, और भरोसे से खाली. उन्होंने मसलिया प्रखंड के टोंगरा थाना क्षेत्र के हाथियापाथर गांव निवासी कुदुस अंसारी और शिकारीपाड़ा थाना क्षेत्र के खेडबना गांव निवासी नजरूल अंसारी पर गबन का आरोप लगाया है.

मजदूरों का आरोप है कि इन दोनों बिचौलियों ने उन्हें नवंबर 2024 में हिमाचल प्रदेश ले जाकर बीआरओ की 108 आरसीसी परियोजना में काम पर लगाया, लेकिन उनके मेहनताने का भुगतान नहीं किया गया. अब ये सभी युवक संथाल परगना के डीआईजी से गुहार लगाए है. उनके पास न वकील हैं, न पहचान. है तो बस एक उम्मीद — कि कोई उनकी आवाज़ सुने, और उनकी मेहनत का हक़ दिलाए.

हम सोचकर निकले थे कि अब घर में खुशी आएगी… लेकिन जब लौटे, तो आंखों में मां के आंसू थे, और दिल में खालीपन।.एक पहाड़िया युवक की यह बात सुनकर पत्थर भी पिघल जाए. 

ये कहानी केवल 18 युवकों की नहीं, बल्कि उस तंत्र की खामोशी की है जो आदिवासी समाज की पीड़ा को अनसुना कर देता है. अब सवाल यह है —क्या शासन और प्रशासन इन मेहनतकश युवकों को न्याय दिला पाएगा?

रिपोर्ट: नंद किशोर मंडल/पाकुड़।

Published at:23 May 2025 04:52 AM (IST)
Tags:Jharkhand newsPakur newsfraud with the labourers of Pakurमजदूरों को नहीं मिले मजदूरी के पैसेपाकुड़ labourPakur policeLabour law
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