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सारंडा के 31 हजार हेक्टेयर क्षेत्र को सेंक्चुअरी घोषित करने की मिली मंजूरी, नक्सलियों का सबसे बड़ा गढ़ बनेगा पशु-पक्षियों का ठिकाना

BY -
Vinita Choubey  CE
Vinita Choubey CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 18, 2026, 3:28:16 AM

रांची (RANCHI) : सुप्रीम कोर्ट से झारखंड सरकार को बड़ी राहत मिली है. शीर्ष अदालत ने एशिया के सबसे बड़े साल वन क्षेत्र (सारंडा क्षेत्र) के 31,468.25 हेक्टेयर इलाके को सेंक्चुअरी घोषित करने की अनुमति दे दी है. बताते चलें कि शुरुआत में इस क्षेत्र को 575 वर्ग किलोमीटर अभयारण्य घोषित करने का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन अब अदालत ने 31,468.25 हेक्टेयर इलाके को सेंक्चुअरी घोषित करने की अनुमति दी है. इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि सेल और वैध खनन पट्टे वाले क्षेत्रों को अभयारण्य के प्रभाव क्षेत्र से बाहर रखा जाए. राज्य सरकार को इस संबंध में एक सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया है. यह आदेश मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने जारी किया.

सुनवाई के दौरान, अदालत ने पूछा कि एनजीटी के पिछले आदेश की तुलना में अभयारण्य क्षेत्र को क्यों बढ़ाया गया है. राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) ने अध्ययन के लिए आठ साल और लगभग ₹3 करोड़ के बजट का अनुरोध किया था. डब्ल्यूआईआई ने बाद में एक रिपोर्ट और मानचित्र प्रस्तुत किया जिसमें 5,519.41 हेक्टेयर क्षेत्र को अभयारण्य घोषित करने का सुझाव दिया गया था.

यह प्रस्ताव वन विभाग के विभिन्न स्तरों से होते हुए पीसीसीएफ तक पहुँचा, लेकिन सरकार ने इसे मंजूरी नहीं दी. बाद में, एनजीटी के दिशानिर्देशों के तहत, सरकार 31,468.25 हेक्टेयर क्षेत्र को अभयारण्य घोषित करने पर सहमत हुई और अदालत से अनुमति मांगी. इस सुनवाई के दौरान, न्यायमूर्ति ने सरकार की मांग का विरोध करते हुए कहा कि 126 खंडों वाले 31,468.25 हेक्टेयर क्षेत्र का पहले ही सीमांकन किया जा चुका है और वहां कोई खनन नहीं हो रहा है, इसलिए क्षेत्र का फिर से सीमांकन करने की कोई आवश्यकता नहीं है.

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को 31,468.25 हेक्टेयर क्षेत्र को अभयारण्य घोषित करने की अनुमति दे दी. इसके अलावा, सेल के अनुरोध पर, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अभयारण्य घोषित करने से कंपनी की मौजूदा खनन गतिविधियां प्रभावित नहीं होंगी, क्योंकि अभयारण्य की सीमा से एक किलोमीटर बाहर तक खनन प्रतिबंध लागू हैं.

 

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