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एंड्राइड मोबाइल में सिमट गया बचपन गिल्ली डंडा, कित कित, पिट्टो हो गए पुराने

BY -
Shreya Gupta
Shreya Gupta
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 14, 2026, 2:27:58 AM

दुमका (DUMKA): समय के चक्र को ना तो हम पीछे ले जा सकते हैं और ना ही उसे रोक सकते हैं वह अनवरत चलता रहता है. लेकिन हम अपनी यादों को पीछे जरूर ले जा सकते हैं और इसी कड़ी में आज हम आप सबों को बचपन की ओर ले जा रहे हैं. जब गिल्ली डंडा, पिट्टो, सरीखे पारंपरिक खेलों का हम सब टोलियां बनाकर लुफ्त उठाते थे. लेकिन आज यह खेल कहीं न कहीं विलुप्त होता जा रहा है. और उसे पुनर्जीवित करने का प्रयास दुमका के सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय ने किया है. जानिए द न्यूज़ पोस्ट की इस खास रिपोर्ट में..

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 बचपन के खेल

गिल्ली डंडा, कित कित, पिट्टो सरीखे पारंपरिक खेल-खेल कर हम सभी बड़े हुए. क्योंकि उस समय ना तो किसी के पास एंड्राइड मोबाइल फोन था और न ही आज के अति लोकप्रिय माने जाने वाले क्रिकेट, हॉकी या बैडमिंटन खेलने के लिए खेल सामग्री खरीदने के लिए रुपया था. समय ऐसा था कि महज 20 से 25 रुपये का क्रिकेट बॉल खरीदने के लिए टीम मेंबर को चंदा इकठ्ठा करना पड़ता था. समय बदला. लोगों की आर्थिक उन्नति हुई. आज के समय में अभिभावक अपने बच्चों को खेल सामग्री खरीद कर तो देते हैं, लेकिन उन बच्चों के साथ खेलने वाला कोई सहयोगी नहीं मिल रहा है. और ऐसा हुआ हर हाथ एंड्राइड मोबाइल फोन आने से. अभिभावक अपने बच्चों को अपनी नजर से ओझल होने देना नहीं चाहते. नतीजा गिल्ली डंडा पकड़ कर मैदान में खेलने वाले बच्चे घर के किसी कोने में बैठकर मोबाइल में खेल कर अपना बचपन व्यतीत कर रहे है. इससे एक तरफ जहां बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास बाधित हुआ, वहीं दूसरी तरफ परंपरागत खेल विलुप्ति के कगार पर पहुंच गया. हुल दिवस के बहाने दुमका के सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय ने पारंपरिक खेलकूद प्रतियोगिता का आयोजन किया. विश्विद्यालय की कुलपति प्रो डॉ सोना झरिया मिंज ने खुद छात्रों के साथ पारंपरिक खेल खेलकर इसकी शुरुआत की.

होनी चाहिए प्रयास की सराहना

मौके पर विश्विद्यालय की कुलपति प्रो डॉ सोना झरिया मिंज ने कहा कि परंपरागत खेल को विलुप्ति के कगार पर पहुंचाने में कुछ खेलों की अति लोकप्रियता के साथ-साथ मोबाइल फोन भी जिम्मेवार है. क्योंकि आज का बचपन मोबाइल में ही सिमट कर रह गया है. जरूरत है परंपरागत खेलों को भी बढ़ावा देने की ताकि बच्चों का बचपन वास्तविक स्वरूप में व्यतीत हो और इसे पुनर्जीवित करने का जो प्रयास सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय ने किया है, उसकी सराहना की जानी चाहिए.

रिपोर्ट:  पंचम झा, दुमका

Tags:News

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