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आखिर बाबा नगरी में दशहरा के दिन क्यों नहीं होता रावण दहन, जानें इसके पीछे का रहस्य

BY -
Priyanka Kumari CE
Priyanka Kumari CE
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 12, 2026, 7:02:29 PM

देवघर(DEOGHAR):बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतिक के रुप में दशहरा का पर्व मनाया जाता है. यही वजह है कि देश के कोने-कोने सहित विदेशों में भी लोग दशहरा के अवसर पर बुराई के प्रतीक रावण का पुतला दहन कर खुशियां मनाते है और एक दूसरे को इस विजय पर विजयादशमी की शुभाकामनाएं देते है, लेकिन अन्य जगहों की परंपरा से अलग हट कर देवघर में विजयादशमी के अवसर पर रावण का पुतला दहन नही किया जाता है. जानकारों की मानें तो देवघर में रावण के द्वारा ही पवित्र द्वादश ज्योतिर्लिंग की स्थापना की गयी है. यही वजह है कि देवघर को रावण की तपोभूमि माना जाता है और यहां स्थापित पवित्र द्वादश ज्योतिर्लिंग को रावणेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है.

रावण की पहचान दो रुपों में की जाती है

जानकारों की मानें तो रावण की पहचान दो रुपों में की जाती है एक तो राक्षसपति दशानन रावण के तौर पर और दूसरा वेद-पुराणों के ज्ञाता प्रकार पंडित और विद्वान के रूप में. देवघर में रावण द्वारा पवित्र द्वादश ज्योतिर्लिंग की स्थापना के कारण उसके दूसरे रुप की अधिक मान्यता है. यही वजह है कि रावणेश्वर महादेव की भूमि देवघर में दशहरा के अवसर पर रावण का पुतला दहन नही किया जाता है.

कल है विजयादशमी,शुभ कार्य के लिए नही होता कोई मुर्हूत

शनिवार को विजयादशमी (दशहरा) है. विजयादशमी का दिन अपने आप मे बहुत महत्त्व रखता है. इस दिन सूर्यास्त के पूर्व से लेकर तारे निकलने तक का समय अर्थात संध्या का समय बहुत उपयोगी है. जानकर बताते हैं कि पराक्रमी रघु राजा ने इसी दिन और संध्या के समय कुबेर पर चढ़ाई करने का संकेत कर कुबेर को ललकारा था कि सोने की मुहरों की वृष्टि करो या तो फिर युद्ध करो. भगवान राम भी रावण के साथ युद्ध में इसी दिन विजयी हुए थे. ऐसे में विजयादशमी के दिन अपने मन में जो रावण के विचार हैं काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, शोक, चिंता इन अंदर के शत्रुओं को जीतना है और रोग, अशांति जैसे बाहर के शत्रुओं पर भी विजय पानी है. इस दिन अपनी सीमा के पार जाकर औरंगजेब के दांत खट्टे करने के लिए शिवाजी ने भी दशहरे का दिन ही चुना था.

विजयादशमी का पूरा दिन स्वयंसिद्ध मुहूर्त है

जानकार बताते हैं कि दशहरा के दिन बिना मुहूर्त के मुहूर्त होता है अथार्त विजयादशमी का पूरा दिन स्वयंसिद्ध मुहूर्त है, इस दिन कोई भी शुभ कर्म करने के लिए पंचांग-शुद्धि या शुभ मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं रहती. इसलिए दशहरे के दिन कोई भी वीरतापूर्ण काम करने वाला सफल होता है. जानकरों की मानें तो दशहरे की संध्या को भगवान के प्रति सच्चे मन से पूजा अर्चना और प्रार्थना करें कि ‘हे भगवान! जो चीज सबसे श्रेष्ठ है उसी में हमारी रूचि करना. इसी का संकल्प लेकर ॐ कार का जप करने से सभी कार्य सिद्ध और सफल होता है.

रिपोर्ट-रितुराज सिन्हा

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