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आखिर मुख्यमंत्री चंपई सोरेन ने क्यों चला जाति जनगणना का दांव! क्या आगामी चुनाव में असरकारी होगा ?

BY -
Samiksha Singh
Samiksha Singh
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 13, 2026, 9:47:51 AM

टीएनपी डेस्क (Tnp desk):- बिहार की तर्ज पर झारखंड में भी जाति जनगणना होगी. इसे लेकर चंपई सोरेन सरकार ने एलान कर दिया है . और कार्मिक विभाग को इसके सर्वेक्षण के लिए जिम्मेदारी सौंप दी है. सोशल मीडिया के एक्स पोस्ट पर मुख्यमंत्री चंपई इसे लेकर बेकरार दिखाई पड़े और लिखा था कि जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी होगी. साफ है कि आगामी लोकसभा और इसके बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में झामुमो इसे कारगर दांव मान रही है. जो झारखंड में उनकी सत्ता को बचा सकती है. 

महगठबंधन के दल रहें हैं समर्थक 

जातिय जनगणना के समर्थन में झामुमो के साथ ही कांग्रेस भी समर्थन करती रही है. राहुल गांधी अपनी न्याय यात्रा के दौरान इसकी वकालत करते दिखाई पड़े. राजद का उतना जनाधार तो झारखंड में नहीं है, लेकिन, इसकी पक्षधर जरुरी रही है. इधर, जातिगत जनगणना पर भाजपा कुछ ज्यादा नहीं बोल रही है. लेकिन, एनडीए में  शामिल आजसू गाहे-बगाहे कास्ट सर्वे की मांग करती रही है. देख जाए तो जाति गणना को लेकर दो साल पहले ही राज्य के सभी दलों की सहमति बनीं थी. इसके बाद सर्वदलीय शिष्टमंडल के सदस्यों ने सितंबर 2021 में दिल्ली जाकर इससे संबंधित मांग पत्र गृह मंत्री को सौंपा था. इस पर केन्द्र सरकार से पहल करने की मांग की गई थी. 

कास्ट सर्वे पर जेएमएम की सोच  

जमीन घोटाले के आरोप में जेल में बद हेमंत सोरेन के बाद मुख्यमंत्री चंपई सोरेन ने मुख्यमंत्री की गद्दी संभाली. मुश्किलों का दौर पार्टी के सामने आया. लेकिन, उसकी कोशिश किसी भी हाल में तमाम चुनौतियों से घबराने की बजाए लड़ने की रही है. तमाम मुश्किल इम्तहानों से जुझ रहे महागठबंधन आगामी चुनाव को लेकर कोशिशें तेज की हुई है.  अगर थोड़ पीछे मुड़कर देखे, तो तत्कालीन हेमंत सरकार के दौरान स्थानीयता और नियोजन नीति बनाने का बिल विधानसभा में पारित कर लिया गया था.  लेकिन, अलग-अलग कारणों के चलते अमल में नहीं आ सका. हेमंत सोरेन की सरकार के वक्त 11 नवंबर 2022 को आरक्षण बिल विधानसभा में पास कराया था. लेकिन, राज्यपाल ने कई आपत्तियों के साथ इसे लौटा दिया था. अगर राज्यपाल की मंजूरी मिल जाती तो ओबीसी आरक्षण की सीमा 14 से बढ़कर 27 फीसदी हो जाती. एसटी रिजर्वेशन भी 16 की जगह 28 प्रतिशत और एससी को 10 की बजाए 12 प्रतिशत आरक्षण मिलता. ईडब्लूएस के लिए आरक्षण सीमा 10 फीसदी पहले से ही लागू थी. सभी को मिलाकर देखा जाए तो हेमंत सरकार ने 77 फीसदी आरक्षण का प्रावधान बिल में किया था

.क्या जेएमएम ने चला है बड़ा दांव  ?

चार साल हेमंत सोरेन के नेतृत्व में महागठबंधन की सरकार चली. लेकिन, लैंड स्कैम के आरोप में उनकी गिरफ्तारी के बाद मुश्किलें खड़ी हो गयी. जेएमएम के साथ ही कांग्रेस में भी अंदर-अंदर किचकिच नजर आयी. सवाल यही है कि अब कुछ महीने के बाद लोकसभा चुनाव का बिगुल बज जाएगा, इसके बाद झारखंड विधानसभा चुनाव भी इसी साल होना है. ऐसी स्थिति में किसी भी कीमत पर पार्टी बेहतर प्रदर्शन करना चाहेगी. कास्ट सर्वे इसी कवायद के तौर पर देखा जा रहा है.
माना जा रहा है कि, जातिए गणना लोकसभा चुनाव में एक वादे के तौर पर काम करेगा, तो विधानसभा चुनाव में इसका फायदा महागठबंधन सरकार को मिल सकता है. झारखंड मुक्ति मोर्चा को विधानसभा चुनाव की चिंता कही ज्यादा है, क्योंकि किसी भी कीमत और सूरत में कम सीट जेएमएम नहीं लाना चाहेगी. क्योंकि आज बड़े दल के तौर पर विधानसभा में काबिज है. जिसके चलते उसका सिक्का चल रहा है.  जातिए गणना को ऐसे वक्त एलान किया गया और जैसी तैयारी की जा रही है. इससे तो कही न कही लगता है कि लोकसभा चुनाव के बाद इस पर  काम शुरु हो जाएगा. सर्वे से फायदा ये होगा कि इससे जातियों की गिनती तो हो ही जाएगी. संख्या बल के हिसाब से आरक्षण और दूसरे

लाभ भी लोगों की योजना सरकार बना सकेगी. 

खैर जातिए गणना से कितना फायदा जेएमएम और उनके सहयोगियों को होगा. ये तो लोकसभा और विधानसभा चुनाव के रिजल्ट बातायेंगे. लेकिन, सीएम चंपई सोरेन के इस फैसले से तो यहीं लगता है कि आगामी चुनाव के मौसम में सियासत की बिसात पर कॉस्ट सर्वे छाया रहेगा . महागठबंधन इसे एक हथियार के तौर पर भाजपा के खिलाफ इस्तेमाल करेगी और वोटर्स को लुभायेगी. 
अब देखना यही है कि जातिए गणना को जनता कैसे लेती है और कितना फायदा झारखंड में मौजूद महागठबंधन सरकार को मिलता है.  

 

 

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