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आंखों की बीमारियों पर एक साइंटिफिक सेमिनार सह क्रिसमस मिलन समारोह का किया गया आयोजन, आंखों में होने वाली बीमारी और समस्या के बारे में दी गई जानकारी

BY -
Ranjana Kumari
Ranjana Kumari
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 15, 2026, 5:29:51 AM

रांची(RANCHI)छ ओफ्थल्मिक फोरम और रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओफ्थल्मोलॉजी – रिम्स के संयुक्त तत्वाधान में द काव्स होटल के सभागार में आंखों की बीमारियों पर एक साइंटिफिक सेमिनार सह क्रिसमस मिलन समारोह का आयोजन किया गया. जिसमें राज्य के 100 के करीब नेत्र चिकित्सकों ने भाग लिया. क्रिसमस मिलन समारोह की संयोजिका सह रांची ओफ्थल्मिक फोरम की सेक्रेटरी डॉ भारती कश्यप ने स्वागत भाषण प्रस्तुत कर कार्यक्रम की शुरुआत की. 

इस सेमिनार में बाहर से आए अतिथि वक्ता नई दिल्ली एम्स के प्रोफेसर. डॉ राजेश सिन्हा, नागपुर के रेटीना सर्जन डॉ प्रशांत बावनकुले और नई दिल्ली के श्रॉफ आई हॉस्पिटल की ग्लूकोमा विशेष डॉ. सुनीता दुबे को रांची ओफ्थल्मिक फोरम और रीजनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओफ्थल्मोलॉजी – रिम्स के पदाधिकारियों के द्वारा सम्मानित किया गया. इस सेमिनार में नई दिल्ली एम्स के प्रोफेसर राजेश सिन्हा ने कॉर्निया की बीमारी में मोतियाबिंद सर्जरी और रिफ्रैक्टिव सर्जरी के पहले की जाने वाली जरूरी जांच के बारे में विस्तार से बताया. नागपुर के रेटीना सर्जन डॉ प्रशांत बावनकुले ने आंखों के पर्दे की बीमारियों की सही पहचान में ओ.सी.टी जांच के महत्व पर प्रस्तुति दी. नई दिल्ली के श्रॉफ आई हॉस्पिटल की ग्लूकोमा विशेष डॉ. सुनीता दुबे ने ग्लूकोमा सर्जरी की नई तकनीक ट्यूब इम्प्लांट सर्जरी एम.आई.जी.एस. सर्जरी के बारे में बताया.

कश्यप मेमोरियल आई हॉस्पिटल की कॉर्निया सर्जन डॉ. निधि गड़कर कश्यप ने कॉर्निया प्रत्यारोपण की जटिल सर्जिकल विधियों को विडियो के माध्यम से प्रस्तुति दी. कार्यक्रम के अंत में रिम्स के नेत्र विभागाध्यक्ष डॉ राजीव गुप्ता ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया. डॉ भारती कश्यप ने कहा कि इस तरह के आयोजन से चिकित्सकों में आपसी भाईचारा बढ़ता है.

नियमित रेटिना टेस्ट का महत्व 

नागपुर के रेटिना सर्जन डॉ प्रशांत बावनकुले ने बताया कि आपको रेटिना चेकअप कब करवाना चाहिए? यदि आप इनमें से किसी भी असामान्य आंख की समस्या का सामना कर रहे हैं, तो तुरंत उनकी जांच करवाएं:

•   दृष्टि में व्यवधान : यदि आप फ़्लोटर्स का अनुभव कर रहे हैं जो आपकी आँखों में घूमते हुए प्रतीत होते हैं या प्रकाश की चमक है, तो एक नेत्र चिकित्सक से तत्काल ध्यान देना सबसे अच्छा है.  ये व्यवधान एक गंभीर समस्या जैसे कि रेटिनल डिटेचमेंट या रेटिनल छेद के परिणामस्वरूप हो सकते हैं.

•   ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई : अचानक आप अपनी दृष्टि के क्षेत्र में किसी विशिष्ट वस्तु पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते हैं या किसी एक वस्तु पर ध्यान केंद्रित करने पर धुंधलापन अनुभव करते हैं तो यह आपकी आंखों की जांच कराने का समय है. ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई को गंभीर नेत्र स्थितियों से जोड़ा जा सकता है जो आपकी दृष्टि की गुणवत्ता को बाधित कर सकती हैं.

•   मधुमेह / उच्च रक्तचाप : यदि मधुमेह जैसे रोग हैं या उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं, तो यह मधुमेह संबंधी रेटिनोपैथी जैसी रेटिना संबंधी समस्याओं को जन्म दे सकता है जो अंधापन के प्रमुख कारणों में से एक है.

•   रतौंधी : यदि आपको रात में स्पष्ट रूप से देखने में समस्या हो रही है जो कि नहीं थी, तो यह समय है कि आप अपनी आंखों की जांच करवाएं. इनसे चोट नहीं लगती लेकिन आंखों की समस्या हो सकती है.

•   धुंधली दृष्टि : धुंधली दृष्टि तीक्ष्णता का नुकसान है, जिससे वस्तु धुंधली और धुंधली दिखाई देती है. कई कारक धुंधली दृष्टि का कारण बन सकते हैं, लेकिन यह आंखों की गंभीर समस्याओं का लक्षण भी हो सकता है.

रेटिनल रोग न केवल भारत में बल्कि पूरे विश्व में वयस्कों में अंधापन और दृष्टि की अपरिवर्तनीय हानि का प्रमुख कारण है. रेटिनल विकार उम्र बढ़ने, मधुमेह या अन्य बीमारियों, आंखों के आघात, या पारिवारिक इतिहास के कारण हो सकता है. आज कल 7  से 10  फीसदी डयबिटीज के युवा मरीजों में डायबिटिक रेटिनोपैथी की समस्या होती है. जिसका तुरंत इलाज न होने पर आँखों की रौशनी जाने का खतरा रहता है. जेनेटिक प्रोफ़ाइल और गलाइसेमिक कंट्रोल के आधार पर किसी को भी डायबिटिक रेटिनोपैथी से प्रभावित होने में कितना भी समय लग सकता है. भारत में लगभग 30 से 40 फीसदी लोग आँखों में कोई समस्या होने पर जाँच काफी देर से करते हैं. डायबिटिक रेटिनोपैथी के केवल 11 फीसदी मरीज ही असल में अपनी आँखों की रौशनी को बचा पाते है. इसलिए डॉक्टर के तौर पर हम इसके बचाव पर ज्यादा जोर देते हैं.

केरेटोकोनस की बीमारी में पेंटाकैम जांच का महत्व 

एम्स, नई दिल्ली के नेत्र चिकित्सक डॉ. राजेश सिन्हा ने बताया कि केरेटोकोनस बीमारी मे कॉर्निया पतला हो जाता है और बाहर की तरफ कोन के आकार में उभर जाता है. जिससे आंखों से धुंधला दिखाई देने लगता है. केरेटोकोनस होने पर आंखे रोशनी और चमक के लिए बेहद सेंसटिव हो जाती है. केरेटोकोनस 2,000 व्यक्तियों में से लगभग एक में होता है, यह 10 से 25 साल के उम्र के लोगों में पाया जाता है. पेंटाकैम से जाँच करने पर शुरुआती स्टेज में ही केरेटोकोनस की पहचान बहुत आसानी से की जा सकती है और C3R मशीन से लेज़र उपचार कर इसे ठीक किया जा सकता है. अगर स्थिति बहुत ज्यादा खराब हो जाती है तो कॉर्निया ट्रांसप्लांट किया जाता है.

 

Tags:OpthalmologyEyeDoctor

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