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मौत के बाद कंधा भी नहीं होता था नसीब, पांव में रस्सी बांध कर घाट तक खींचा जाता था नचनिए का शव

BY -
Shreya Gupta
Shreya Gupta
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 19, 2026, 9:59:51 AM

धनबाद(DHANBAD)-पहले राजा रजवाड़े अपने लिए बनवाये तालाब के आसपास नचनियों को बसाते थे. राजमहल के लोगों का मनोरंजन करने के अलावा नचनिये दूसरे रोजगार भी करते थे. नचनिया महिला और पुरुष, दोनों होते थे. सामंतवाद का दौर ऐसा था कि जब किसी नचनिए की मौत होती थी, तो घाट तक उन्हें कन्धा देकर नहीं, बल्कि पैर में रस्सी बांधकर खींचकर पहुंचाया जाता था. इस मार्मिक प्रसंग का उल्लेख पूर्व आईएएस और साहित्यकार श्रीराम दुबे के हाल ही रचित उपन्यास "नाचनी" में है.

आपदा को बनाया अवसर

कारोना काल में श्रीराम दुबे ने आपदा को अवसर में बदलते हुए कुल पांच किताबें लिख डालीं. इनमें चार उपन्यास और एक काव्य शामिल हैं. लेखक का कहना है कि सभी कृतियां यर्थाथ से जुड़ी हैं. वैसे भी कहा जाता है कि साहित्य, समाज का दर्पण होता है. साहित्यकार जो देखता है, उसे एक शैली दे देता है. उपन्यास में नक्सलबाड़ी पर जिक्र हुआ है कि नक्सल आंदोलन कैसे नक्सलबाड़ी से निकल कर बड़ा बन गया है.

 चक्रव्यूह पर चोरी से बनी फिल्म

श्रीराम बताते हैं कि कोयलांचल की भूमिगत आग पर उन्होंने एक पुस्तक चक्र व्यूह लिखी थी. इस पर उन्हें धोखे में रखकर बॉलीवुड के निर्माता निर्देशक आशु तिर्खा ने "कोयलांचल" फिल्म बना ली. इसके खिलाफ उन्होंने धनबाद कोर्ट में निर्माता निर्देशक के खिलाफ मुक़दमा किया है, जो अभी लंबित है. अभी वे एक नई पुस्तक की पांडुलिपी तैयार कर रहे हैं. यह पुस्तक पंचायत से लेकर देश स्तर तक राजनीति की गंदगियों को सामने लाएगी. कैसे पंचायत चुनाव से शुरू राजनीति बढ़ते बढ़ते देश स्तर पर पहुंच जाती है और फिर कैसी कैसी बुराइयां इसमें जगह पा लेती है, इन सब का पुस्तक में जिक्र होगा.

रिपोर्ट : अभिषेक कुमार सिंह, ब्यूरों चीफ, धनबाद

Tags:News

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