धनबाद (DHANBAD)- 26 सितम्बर '1995 का दिन न धनबाद भुला है और न ही भूल पाएगा. उस दिन की प्रलंयकारी बारिश से चहुंओर तबाही ही तबाही थी. नदी,नाले उफान पर थे. जोडिया नदी कई गुना अधिक प्रवाह से बह रही थी. कतरास की कतरी नदी भी अपने कच्छार वाले इलाके को छोड़कर राह बदल ली थी. राह ऐसी बदली की पूरी नदी का पानी कतरास की गजलीटांड़ कोलियरी में समां गया. जिसके बाद पूरे इलाके में कोहराम मच गया. देखते ही देखते कुल 65 कोयला मजदूरों की जलसमाधि हो गई.
इस तबाही से बचाव के लिए बचाव दल का कोई तरकीब काम नहीं आया. बीसीसीएल प्रबंधन के होश फ़ाख़्ता थे. धनबाद प्रशासन से लेकर पटना की सरकार तक हिल गई. जिसके बाद जलसमाधि लिए मजदूरों के परिजनों के क्रंदन से इलाका सिहर उठा. अपने घरवालों के जीवित बचे होने की आस में लोग लगातार कई दिनों तक घटनास्थल के आसपास ही जमे रहे. किसे पता था कि पानी भरने के लिए खदान में गए लोग वापस नहीं लौटेंगे. घटना की जाँच बैठी, जाँच हुई भी लेकिन उसका परिणाम किसी को पता नहीं चल पाया.
देश को जरुरत का लगभग आधा कोकिंग कोयला धनबाद से आता हैं
आज उन मजदूरों की बरसी है. नेता पहुंचेंगे, अधिकारी जाएंगे, पीड़ित परिवार के लोग भी जाएंगे, रोयेंगे –बिलखेंगे. कोयला मजदूरों के परिवारजनों के आंसू कम से कम ऐसी घटनाओं पर न निकले,इसपर न सार्थक चर्चा होगी और न ही ठोस इंतजाम किये जाएंगे. ऐसा तब हो रहा है,जब देश को जरुरत का लगभग आधा कोकिंग कोयला धनबाद से मिलता है.
रिपोर्ट:अभिषेक कुमार सिंह,धनबाद
