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जब तक स्वास्थ्य विभाग की खुलती नींद, तब तक सारंडा में ब्रेन मलेरिया से 6 आदिवासियों की हो गई मौत

चाईबासा ( CHAIBASA) -  पश्चिम सिंहभूम झारखण्ड का सबसे बड़ा आदिवासी बहुल जिला है. खनिजों से भरे इस जिले में आज भी लोगों को मुलभूत सुविधाएँ नहीं मिल रही है.यही वजह है कि यहाँ के लोग मलेरिया और डायरिया से बड़ी संख्या में पीड़ित होते हैं.बीमारी से लड़ते लड़ते जिंदगी से जंग हारकर मौत के आगोश में ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं. यह एक कड़वा सच है जो झारखण्ड के लिए बदनुमा दाग है.पश्चिम सिंहभूम में आज भी कई गाँव और पंचायत ऐसे हैं जहाँ ना तो सड़क है, ना बिजली, ना पीने के लिए पानी की उचित सुविधा और ना ही स्वास्थ्य और चिकित्सा व्यवस्था. शिक्षा की भी स्थिति ठीक नहीं है. अशिक्षा के कारण लोग चिकित्सा पर कम झाड़ फूंक पर ज्यादा विश्वास करते हैं.पश्चिमी सिंहभूम जिला के अति पिछड़े टोंटो प्रखंड के सुदूर गांव बीरसिंह हातु के बाईहातु टोला और खूंटपानी प्रखंड का रोरो गांव डायरिया, मलेरिया और वायरल फीवर की चपेट में है.यहाँ पिछले 10 दिनों में 6 लोगों की मौत उल्टी, दस्त व बुखार से हो चुकी है. बीरसिंह हातु गांव की आबादी 450 और रोरो गांव की आबादी 622 है.ये सभी मौतें 8 सितंबर से 17 सितंबर के बीच हुई हैं.

इलाज के बजाय झाड़-फूंक और बोंगा पूजा करते रहे परिजन

मगर स्वास्थ्य विभाग को इसकी भनक तक नहीं लगी. मरने वालों में 4 बच्चे भी शामिल हैं. लोग इलाज के बजाय झाड-फूंक और बोंगा पूजा के चक्कर में समय गवां रहे थे.बीमार लोगों की मौतें होती चली गयी.पंचायत के मुखिया राजेन बारी ने प्रखंड मुख्यालय आकर इसकी जानकारी दी तब जाकर पश्चिम सिंहभूम जिले का स्वास्थ्य महकमा सक्रिय हुआ.सदर अस्पताल चाईबासा के चिकित्सा पदाधिकारी डा. गणेश बिरुली के नेतृत्व में 16 चिकित्साकर्मियों की टीम प्रभावित गांव जाकर स्वास्थ्य कैंप लगाकर लोगों का इलाज शुरू किया.सर्वेक्षण कैंप एवं जांच पड़ताल के बाद दोनों गांव में अधिकतर लोग सर्दी,खांसी,बुखार तथा कुछ में दस्त व उल्टी आदि के लक्ष्ण पाये गये हैं. डॉक्टरों की मानें तो यहाँ ब्रेन मलेरिया का प्रकोप है.उसके बाद लोग डायरिया की चपेट में आ रहे हैं जिससे इनकी मौत तेजी से हो रही है.

झारखंड बनने के बाद भी सारंडा में नहीं बहाल हुई स्वास्थ् व्यवस्था

चाईबासा के सारंडा में हर साल डायरिया और मलेरिया दर्जनों  लोगों की मौतें होती हैं. चिकित्सीय सुविधों के आभाव में ग्रामीण झाड़ फूंक कर बीमारी से जंग जीतने की कोशिश करते रहे हैं. स्वास्थ्य विभाग इन  सारी बातों से अवगत है फिर भी सारंडा में स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारा नहीं गया..पश्चिम सिंहभूम जिले में ऐसे पिछड़े हुए गाँव की संख्या बड़ी तादाद में हैं.लेकिन आज़ादी के बाद भी यहाँ के हालात नहीं सुधरे हैं.झारखण्ड अलग राज्य भी बना लेकिन इन सुदूरवर्ती गाँव में रहने वाले ग्रामीणों को मुलभुत सुविधा तक मयस्सर नहीं हुई.सरकार आती जाती रही लेकिन इन ग्रामीणों को बेहतर ज़िन्दगी देने में किसी भी सरकार ने सकारात्मक प्रयास नहीं किया.

रिपोर्ट : जयकुमार, चाईबासा

Published at:21 Sep 2021 03:46 PM (IST)
Tags:News
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