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कोल्ड फील्ड एक्सप्रेस में अनोखे तरीके से मनाया जाता है विश्वकर्मा पूजा, कोरोना के कारण फीका पड़ा परंपरा

BY -
Abhishek Kumar  Dhanbad
Abhishek Kumar Dhanbad
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 14, 2026, 11:30:04 AM

धनबाद (Dhanbad) से हावड़ा तक चलने वाली 'कोलफील्ड एक्सप्रेस' इस  वर्ष 17 सितंबर को  'भगवान विश्वकर्मा पूजा स्पेशल' ट्रेन नहीं बन पाई. विश्वकर्मा पूजा स्पेशल' ट्रेन. ... बनने के लिए ट्रैन को आसनसोल स्टेशन का इंतजार करना पड़ा.  कोरोना के कारण 40 साल की परंपरा दो सालो से टूट रही है.  धनबाद के डेली पैसेंजर पूजा करने की साहस  नहीं कर पाए, लेकिन बंगाल वालों ने परंपरा का भरसक निर्वहन किया. 

'कोलफील्ड एक्सप्रेस' प्रत्येक वर्ष 17 सितंबर को पिछले दो सालो से  'भगवान विश्वकर्मा पूजा स्पेशल' ट्रेन नहीं बन पाई  है. इस दिन गाजे बाजे के साथ दैनिक यात्री ट्रेन के चालक और गार्ड के साथ मिलकर इंजन की पूजा कर अपना सफर शुरू करते थे.  ट्रेन के कुल 18 कोचों में से आधा दर्जन पैसेंजर कोचों में भी  विश्वकर्मा की प्रतिमा रखकर पूरे भक्ति भाव के साथ पूजा की जाती थी. पैसेंजरों के बीच प्रसाद का वितरण भी होता था. 
बंगाल से धनबाद सटे  होने के कारण डेली पैसेंजर यहाँ के कारोबार का एक हिस्सा है. रोज सुबह जाते है और शाम को सामान  लेकर इसी  ट्रैन से वापस होते है. ऐसे में दैनिक यात्री सिर्फ इसे ट्रेन नहीं मानते बल्कि रोजी रोटी का हिस्सा मानते  हैं. यहीं कारण है कि विश्वकर्मा पूजा के दिन  दैनिक यात्री अपने घर की तरह ट्रेन के डिब्बों को सजाते हैं और फिर पूरी निष्ठा  से भगवान विश्वकर्मा की पूजा करते हैं.
पूजा भी पूरी भक्तिभाव के साथ होती  है. प्रत्येक स्टेशन पर गाजे बाजे के साथ भगवान शिल्पी विश्वकर्मा का भव्य स्वागत होता है. बाहर के यात्रियों के लिए ये नजारा जहां कौतूहल पैदा करता है वहीं आस्था, भक्ति और दैनिक सफर करने वाले यात्रियों के बीच भाईचारगी का सन्देश देता  है. भले ही कोरोना की वजह से विश्वकर्मा पूजा धनबाद स्टेशन पर इस बार नहीं हो पाई लेकिन बंगाल के आसनसोल के यात्रियों ने पूरे भक्ति भाव के साथ देव शिल्पी भगवान विश्वकर्मा की पूजा धूम धाम से किये. भारतीय ट्रेन में अनूठे किस्म के इस पूजा में मज़हब की दीवार टूटते हुए दिखी.जहां हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई सभी  शामिल होते है. यहां आस्था कौमी एकता के रूप में बदल जाती है और भारतीय ट्रेन हिंदुस्तान के साँझी संस्कृति की वाहक हो जाती है. यहीं कारण है कि इस पूजा में ट्रेन के पायलट गार्ड से लेकर आम यात्री शामिल होते है. सभी का मकसद पूरे वर्ष अपनी यात्रा की सलामती के साथ कारोबार में बरक़त से जुड़ी हुई है. यहां ट्रेन की बोगी ही ईश्वर भक्ति का केंद्र बन जाता है. आज़ादी के बाद से ये सिलसिला आज तक जारी है. वैश्विक महामारी कोरोनकाल में ही सिर्फ़ दो साल से विश्वकर्मा पूजा करने में यात्रियों को परेशानी आई ,इसलिये इस बार यात्री भगवान विश्वकर्मा से कोरोना समाप्त होने की गुहार लगा रहें है.

Tags:News

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