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पाटकर पेंटिंग : चित्रों में रंग भरने वाले चित्रकार की जिंदगी ही रंगहीन, सरकारी उपेक्षा से लुप्त हो रहा पेंटिंग

BY -
Ranchi Bureau
Ranchi Bureau
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 18, 2026, 8:55:29 AM

पूर्वी सिंहभूम (PURVI SINHBHUM ) - आमाडुबी गांव पूर्वी सिंहभूम के धालभूमगढ़ प्रखंड का हिस्सा है.पाटकर चित्रकारी के लिए ही यह जाना जाता है. यह चित्रकारी लुप्तप्राय है. यहीं के अनिल चित्रकार ने इसे देश- विदेश में पहचान दिलाई है. देश और विदेशों से कला प्रेमियों ने गांव आकर उनसे 10 हजार से 30 हजार रुपये तक पेंटिंग खरीदी थी.अब अनिल गुमनामी की जिंदगी बसर कर रहे हैं. मिट्टी के झोपड़ी में जीवन बसर कर रहे हैं.बरसात के दिनों में  हाल यह है कि मिट्टी के घर में छत से पानी टपकता  है. पीएम आवास की आस में अपना मिट्टी का घर भी तोड़ दिया कि अब पक्का मकान बनेगा , लेकिन वह भी वन भूमि पट्टा के कारण अटक गया,हाल बेहाल है.लेकिन इनकी सूनने वाला कोई नही है. 

तीस सालों से  मिट्टी के मकान में रह रहे हैं अनिल 

अनिल चित्रकार का पीएम आवास स्वीकृत भी हुआ , खाते में पीएम आवास की पहली किस्त का रूपया भी आ गया ,लेकिन वन भूमि का पट्टा नही होने के कारण बैक से रूपये निकालने पर रोक लगा दी गयी है. आवास बनने की आस में अपने मिट्टी घर के करकट छप्पर को निकाल दिया कि अब पक्का मकान बनेगा , लेकिन जैसे ही छप्पर को निकाला गया वैसे ही प्रखंड से बैक खाते में आये रूपये को यह कह कर लॉक कर दिया कि अनिल चित्रकार के पास वन पट्टा नही है.अब अनिल चित्रकार बीते तीस सालों से अपने मिट्टी के मकान में रह रहे हैं.अब ये तसवीर यादो में ही रह जायेगी - क्योंकि अनिल चित्रकार अब आंखो से अंधे होने लगे है.उन्हें अब दिखायी नही पड़ता है. सामने कोई खडा हो तो केवल छाया- आकृति ही दिखायी पड़ती है.अनिल चित्रकार अब पेंटिंग नहीं कर पा रहे है.

 पाटकर पेंटिंग पेड़ के छाल और पत्तों के रंग से ही बनाई जाती है


अपनी पूरी जिन्दगी पाटकर पेंटिंग को आगे बढ़ाने में लगा दी. लेकिन अब अपनी बीमारी और समस्या से घीरे पड़े है.जब अनिल की तबयीत ठीक थी तो संगीत के साथ खुशनुमा दिल से पाटकर पेंटिंग किया करते थे.अपने पुराने समय को याद करते हुए अनिल  बताते है कि पेंटिंग पेड़ के छाल और पत्तों के रंग से ही बनाई जाती है.कला को बचाने के लिये पर्यटन विभाग ने कुछ साल पहले अमाडुबी गांव को पर्यटन गांव घोषित तो किया.अनिल के अनुसार, 300 से 30 हजार रुपये तक में बिकने वाली इस पेंटिंग की ब्रांडिंग राज्य सरकार ठीक तरह से नहीं कर पा रही है. हाल यह है कि अब यह पेंटिंग को छोड़ कर गांव के बच्चें रोजगार की तलाश में दूसरे शहर की ओर रुख कर रहे हैं.

रिपोर्ट : प्रभंजन कुमार (घाटशिला)

Tags:News

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