टीएनपी डेस्क (TNP DESK): सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें पिछले साल तमिलनाडु में लाए गए कानून को रद्द कर दिया गया था, जिसमें वन्नियारों को सबसे पिछड़ा वर्ग (एमबीसी) समुदाय के भीतर, सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश में 10.5 प्रतिशत आरक्षण प्रदान किया गया था. शीर्ष अदालत ने कहा कि यह पूरी तरह से वन्नियार समुदाय के सापेक्ष पिछड़ेपन को दिखाने के लिए पर्याप्त डेटा के बिना संख्याओं के आधार पर किया गया था.
जस्टिस एल नागेश्वर राव और बीआर गवई की राय
एचसी के फैसले को बरकरार रखते हुए, जस्टिस एल नागेश्वर राव और बीआर गवई ने कहा कि यह राय है कि कानून ने वन्नियार को एमबीसी के बीच अन्य लोगों की तुलना में एक अलग समूह के रूप में मानने के लिए कोई पर्याप्त आधार प्रदान नहीं किया. इस प्रकार, 2021 अधिनियम संविधान के विरुद्ध है. अदालत ने यह भी फैसला सुनाया कि हालांकि कानून बनाने की राज्य की शक्ति पर कोई बंधन नहीं है और जाति इस तरह के आंतरिक आरक्षण का आधार हो सकती है, यह एकमात्र आधार नहीं हो सकता है.
इंद्रा साहनी मामले का हवाला
बेंच ने इंद्रा साहनी मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा, "जाति आधारित वर्गीकरण के मुद्दे पर", उसने कहा था कि "जाति प्रारंभिक बिंदु हो सकती है लेकिन एकमात्र आधार नहीं हो सकती है. इसी तरह, जाति आंतरिक आरक्षण प्रदान करने के लिए प्रारंभिक बिंदु हो सकती है लेकिन यह राज्य सरकार पर निर्भर है कि वह निर्णय की तर्कसंगतता को सही ठहराए और यह प्रदर्शित करे कि जाति एकमात्र आधार नहीं है.
मद्रास उच्च न्यायालय का फैसला
मद्रास उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया था कि चुनाव से कुछ समय पहले तत्कालीन अन्नाद्रमुक सरकार द्वारा लाया गया कानून वन्नियारों की सामाजिक-शैक्षिक स्थिति पर मात्रात्मक डेटा के बिना था.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार ने तमिलनाडु पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष की सिफारिशों को स्वीकार करने में गलती की थी, जिसके आधार पर उसने कानून बनाया क्योंकि वे जनार्थनम आयोग की रिपोर्ट पर आधारित थे जोकि पुराने आंकड़ों पर आधारित थी.
रिपोर्ट: अशु शुक्ला, रांची
