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हकीकत : न रोजी-रोटी, न सुविधाएं, पलायन न करें तो क्या करें बिरहोर !

BY -
Samiksha Singh
Samiksha Singh
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 12, 2026, 2:18:45 PM

गुमला (GUMLA) : अपने सूबे में पलायन रोकने के लिए कागजी योजनाओं की कमी नहीं, वहीं फंड भी खूब बहाए जाते हैं. पर इसपर लगाम नहीं लग पाता. कारण साफ है, धरातल पर लोगों की वे आवश्यक जरुरतें भी पूरी नहीं हो पातीं जो सांस को बरकरार रखने के लिए जरुरी है. इन्हीं कारणों से रोजगार की तलाश में गुमला से भी लोग पलायन करने को विवश हैं. गुमला के डुमरी प्रखंड अंतर्गत करनी पंचायत के बिरहोर कलोनी में रहने वाले आदिम जनजाति के 17 बिरहोर परिवार आज भी अभावों के बीच जिंदगी गुजर बसर कर रहे हैं. वर्तमान में इनके पास रहने के लिए जर्जर आवास हैं. सालों भर डांड़ी का पानी पीते हैं, शिक्षा की कमी है, सरकार की ओर से राशन मिलता है, उसी से अपना जीवन गुजार रहे हैं.

रहने के लिए घर, लेकिन रोजगार के साधन नहीं

गुमला जिला के डुमरी ब्लॉक के करनी गांव के बिरहोर कोलोनी में सबके लिए शौचालय बना हुआ है, बिजली जल रही है. परंतु रोजगार के कोई साधन नहीं हैं. इस संबंध में प्रकाश बिरहोर, चिन्ता बिरहोरिन, सुमन बिरहोर, निशा बिरहोरिन ने बताया कि हमलोगों को सरकार द्वारा करीबन 15 वर्ष पूर्व प्रखंड के करमदोन गांव के बाहर एक बिरहोर कलोनी बनाकर बसाया गया था. जहां हमलोगों को रहने के लिए बिरसा आवास मिला था. उन्होंने बताया कि आज 15 वर्ष बीत गए और सारे आवास अब जर्जर हो चुके हैं. हमलोगों के पास जीवन बसर करने के लिए जमीन जायदाद नहीं है और ना ही किसी प्रकार की स्वरोजगार के साधन हैं. गांव के बच्चे 5-6वीं तक पढ़ाई कर रोजगार की तलाश में दूसरे राज्य कमाने चले जाते हैं.

स्वरोजगार के लिए कुछ तो करो सरकार !

गांव के सभी ग्रामीणों ने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि हमें लंबे अरसे के बाद एकबार फिर रहने के लिए बिरसा आवास मिला है. सरकार ने हमें तो आवास दिया मगर दूसरी तरफ रोजगार की व्यवस्था नहीं है. सरकार हमारे स्वरोजगार के लिए बकरी,सुअर, मुर्गी,गाय पालन योजना का लाभ दें. ताकि हम सभी लोग स्वरोजगार कर अच्छे से जीवन जी सके. साथ ही हमारी आर्थिक स्थिति मजबूत हो सके. जंगली कंद मूल और फल फूल खाकर रहते हैं. जिंदगी में रोजाना घर में नमक, तेल,साबुन सहित अन्य जरूरत की चीजों की आवश्यकता पड़ती है. जिसके लिए रोजगार नहीं होने के कारण हमलोग आसपास के गांवों में जाकर वहां रेजा कुली व मजदूरी करते हैं और काम नहीं रहता है तो दूसरे गांव या शहर काम की तलाश में चले जाते हैं.

जिम्मेवार कहते हैं -

जब आदिम जनजातियों के लिए बेहतर रोजगार की व्यवस्था की बात जिला के उपायुक्त सुशांत गौरव से की गई तो उन्होंने कहा कि वे खुद इस बात को लेकर काफी गंभीर हैं. उनका मानना है कि वे इन लोगों को उनकी इच्छा के अनुसार रोजगार से जोड़ेंगे. उपायुक्त ने कहा कि इनका जीवन बेहतर हो इस दिशा में कार्रवाई की जाएगी.

रिपोर्ट : सुशील कुमार सिंह, गुमला

 

Tags:News

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