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कांग्रेस का चिंतन शिविर : 'बुजुर्गों के बजाय युवाओं के कंधे पर देनी होगी जिम्मेवारी

BY -
Abhishek Kumar  Dhanbad
Abhishek Kumar Dhanbad
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 14, 2026, 7:02:09 AM

धनबाद (DHANBAD) : झारखंड प्रदेश कांग्रेस का चिंतन शिविर पारसनाथ के मधुबन में आज दूसरे दिन की चल रहा है. इस चिंतन शिविर के कई मायने और मतलब निकाले जा रहे हैं.  चिंतन शिविर का निष्कर्ष क्या होगा, इस पर सिर्फ कांग्रेस नहीं ,सरकार में शामिल जेएमएम, राजद की भी नजर है.  शिविर में लगभग 150 से अधिक डेलिगेट  भाग ले रहे हैं. इतने लोगों को सुनने के बाद कोई निष्कर्ष निकलेगा. चूंकि भाषा विवाद पर अभी झारखंड में कांग्रेस कहीं ना कहीं फंसी हुई है, इस पर भी पार्टी को अपना स्टैंड साफ़ करना होगा.

 झारखंड के प्रभारी आरपीएन सिंह ने दिया था इस्तीफा

आप को बता दें कि फरवरी '2022  में झारखंड के प्रभारी आरपीएन सिंह ने कांग्रेस के प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था और बीजेपी जॉइन कर लिए. उसके बाद कयास लगाए जा रहे थे कि उनके विश्वासपात्र विधायक धोखा दे सकते हैं. कांग्रेस आलाकमान ने बिना  विलंब किए अविनाश पांडे को प्रभारी नियुक्त कर दिया. अविनाश पांडे के बारे में कहा जाता है कि यह कांग्रेस के संकटमोचक हैं. राजस्थान में इन्होंने गहलोत की सरकार को बचा लिया था.  संभवत: इसी सब सोच के बाद केंद्रीय नेतृत्व ने अविनाश पांडे को झारखंड का प्रभारी बनाया है और यह चिंतन शिविर भी उन्हीं की सोच का एक प्रतिफल है.

 निर्णय को जमीन  तक पहुंचना भी चुनौती 

विदित हो कि  झारखंड में कांग्रेस 'बुजुर्गों के होश और युवाओं के जोश' के मिश्रण से जो काम कर रही है. उसमें कुछ ना कुछ बदलाव करने की बातें उठ रही हैं.  अब देखना होगा कि चिंतन शिविर में इस मसले पर कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता क्या निर्णय लेते हैं, उस निर्णय को कैसे जमीनी स्तर तक पहुंचाते हैं. झक झक खादी और बड़ी-बड़ी गाड़ियों के कल्चर से कांग्रेस के लोग कैसे बाहर निकल पाते हैं, ऐसे बहुत सारे सवाल हैं जिन का उत्तर कांग्रेस के चिंतन शिविर में ढूंढने की कोशिश  होगी. कितनी सफलता मिलती है ,यह भविष्य के गर्भ में है. कांग्रेस की स्थानीयता व भाषा विवाद भी गले की हड्डी बन गई है. भाजपा की तरह यहां भी चाल, चरित्र व चेहरा को लेकर भी पार्टी में चर्चा जोरों पर है. झामुमों के साथ गठबंधन में उसे अपने जनाधार को बचाए रखने की भी चुनौती है. इसलिए कई मुद्दे पर "समझौतावादी" रुख़ ने पार्टी के वोट बैंक पर असर डाला है. बिहार में जो हस्र कांग्रेस का हुआ वैसा झारखंड में ना हो इसके लिए कांग्रेस को स्वाभाविक बने रहना होगा. इसलिए किसी भी पार्टी को लंबे समय तक जनता का सिरमौर बने रहने के लिए सत्ता से ज़्यादा संगठन पर जोर देना होगा. आयातित नेताओं को चुनाव लड़ाने के बजाय अपने समर्पित कार्यकताओं पर भरोसा करना होगा. कांग्रेस पार्टी में जान फूंकने के लिए युवा ब्रिगेड को लाना होगा. 2024 का मिशन से पहले पंचायत चुनाव व नगर निकाय चुनाव में पार्टी को बेहतर प्रदर्शन करना होगा. ये चुनाव भले ही पार्टी आधारित नहीं होगा, लेकिन ज़मीन का थाह पता इसी चुनाव से पता चल जाएगा. गिरिडीह पारसनाथ में आयोजित कांग्रेस के चिंतन शिविर में आख़िर पार्टी को कौन कौन सी बात की चिंता सता रही है, इस पर हमारे धनबाद ब्यूरो हेड अभिषेक कुमार सिंह ने वरिष्ठ पत्रकार सत्यभूषण सिंह से खास बातचीत की ... देखिये एक ख़ास विश्लेषण ...चिंतन की चिंता

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