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JSSC CGL : नौकरी की शर्तों में ही उलझे अभ्यर्थी, भाषा-विवाद में कई जिलों के अभ्यर्थी सड़क पर  

BY -
Prakash Tiwary
Prakash Tiwary
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 14, 2026, 10:35:16 AM

रांची (RANCHI) : झारखंड सरकार ने बेरोजगारों को नौकरी देने के लिए नियुक्ति वर्ष की घोषणा की है. सरकार के इस घोषणा के बाद सोशल मीडिया से लेकर दूसरे तमाम लोग सरकार की तारीफ करते थक नहीं रहे हैं. लेकिन सरकार की इस घोषणा की तरह ही सोशल मीडिया पर आधा सच और आधा फ़साना छाया हुआ है. राज्य में वैकेंसी भी है, सरकार भी है, वादे भी हैं लेकिन वादे को पूरा करने की सोच की बात करें, तो इसमें कई उलझने भी हैं. अब आपको नौकरी के विज्ञापन और इस खेल को समझाने की कोशिश करते हैं.

JSSC CGLके माध्यम से सरकार ने नौकरी तो निकाला है, लेकिन नौकरी के साथ ही जिस तरह से भाषा की शर्ते रखी गई हैं, उससे नहीं लगता कि लोगों को आसानी से नौकरी मिल पाएगी.  लोग नौकरी की तैयारी छोड़ नौकरी की शर्तों पर ही उलझ पड़े हैं. यानि ना तो नौ मन तेल होगा और ना राधा नाचेगी. फिलहाल सरकार की नौकरी के विज्ञापन और इसके पीछे की नई राजनीति को समझने की कोशिश कीजिए.

क्या है भाषा विवाद?

पहले यह समझते हैं कि यहां हम किस भाषा विवाद कि बात कर रहे हैं. JSSC के CGL यानि कि combined graduate level परीक्षा के लिए दो परीक्षाएं होगी. एक होगी प्रारम्भिक परीक्षा जिसे PRE कहते हैं और दूसरी होगी MAINS जिसे मुख्य परीक्षा कहा जाता है.

PRE परीक्षा में भाषा की कोई बाध्यता नहीं है. लेकिन, MAINS परीक्षा में भाषा आधारित दो परीक्षाएं होती हैं. जो पेपर 1 है. उसमें हिन्दी और इंग्लिश दोनों ही विषयों के प्रश्न पूछे जाएंगे. हालांकि, परीक्षार्थी को इसमें दोनों भाषाओं को मिलाकर सिर्फ 30 प्रतिशत अंक ही चाहिए होता है और यह क्वालीफाइंग होता है. मतलब कि इसमें सिर्फ आपको पास होना होता है. इसके नंबर फाइनल मार्क्स में नहीं जोड़े जाते.

इसके बाद पेपर 2 होता है और यही पेपर भाषा विवाद का पूरा कारण है. इस पेपर में विभिन्न जिलों के लिए अलग-अलग क्षेत्रीय भाषा सूचीबद्ध की गई है. जिसमें प्रत्येक जिले के लोग अपने जिले के लिए घोषित क्षेत्रीय भाषाओं की ही परीक्षा दे सकते हैं. इस सूची के तहत 12 क्षेत्रीय भाषाओं की परीक्षार्थी परीक्षा दे सकते हैं.  

अब मामला क्या है?

दरअसल, सरकार के कार्मिक विभाग ने नियुक्ति नियमावली में संशोधन करते हुए भोजपुरी, मगही और अंगिका को भी क्षेत्रीय भाषा कि सूची में शामिल कर लिया है. पहले इन भाषाओं को इस सूची में शामिल नहीं किया गया था, जिसके कारण पलामू, गढ़वा के युवाओं ने इसका विरोध किया था. वहीं झारखंड सरकार के मंत्री मिथिलेश ठाकुर ने भी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से मगही, भोजपुरी और अंगिका को सूची में शामिल करने का अनुरोध किया था. इसके बाद इन तीन भाषाओं को फिर से इस सूची में शामिल किया गया.

इसके बाद लग रहा था कि अब विवाद थम जाएगा. लेकिन, हुआ बिल्कुल इसके उल्टा. पलामू, गढ़वा और लातेहार से तो छात्रों का विरोध समाप्त हो गया. लेकिन अब यह विरोध बोकारो और धनबाद पहुंच गया है. और विरोध भी ऐसा कि लोग सड़क पर उतर आए हैं. विरोध को शांत कराने गए पूर्व सांसद को तो जान बचाकर भी भागना पड़ा. इन जिलों के लोगों की मांग है कि मगही और भोजपुरी जो इन जिलों में भी सूचीबद्ध किया गया है उसे सरकार वापस करे. लोगों की मांग है कि इससे उनके अधिकारों का हनन होगा और उनकी जगह बाहरी लोग उनका हक ले जाएंगे.

शिक्षा मंत्री आंदोलनकारियों के समर्थन में उतरे

बोकारो और धनबाद के लोगों के आंदोलन में शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो, गोमिया से आजसू विधायक डॉ लंबोदर महतो खुलकर समर्थन में आए हैं. शिक्षा मंत्री जगरनाथ महतो ने सभी जिलों से मगही और भोजपुरी को हटाने की मांग मुख्यमंत्री से कर दी है. अगर सरकार फिर से इन तीनों भाषाओं को क्षेत्रीय भाषा से हटाती है तो धनबाद और बोकारो में तो आंदोलन शांत हो जाएगा, लेकिन यही आंदोलन की आग उन जिलों में जरूर पहुंचेगी, जहां ये भाषाएं मुख्य रूप से बोली जाती हैं. ऐसे में सरकार खुद कन्फ्यूज़ है कि वो क्या कर रही है और क्या करेगी.

अब इसका समाधान क्या है?

अगर समाधान खोजने की सरकार कोशिश करे तो समाधान तो बहुत मिल जाएंगे. लेकिन सरकार इसकी कोशिश करती हुई दिखाई नहीं दे रही है. जिन जिलों में अभी आंदोलन हो रहा है वहां पर मगही, भोजपुरी बोलने वालों की संख्या बहुत कम है. ऐसे में सरकार को चाहिए कि जिन जिलों में जो भाषा ज्यादा बोली जाती है, उन जिला के लोगों को उसी भाषा में परीक्षा देने दिया जाए. जैसे पलामू में मगही और भोजपुरी ज्यादा बोली जाती हैं तो वहां के लोगों को इन भाषा में परीक्षा देने दी जाए. वहीं बोकारो और धनबाद में खोरठा बोली जाती है तो वहां के लोगों के लिए खोरठा भाषा को ही क्षेत्रीय भाषा घोषित करनी चाहिए.

फिलहाल, इस भाषा विवाद का क्या हल निकलता है इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं. लेकिन सरकार की मंशा पर शक जरूर होता है. सरकार सच में युवाओं को रोजगार देना चाह रही है या फिर सिर्फ मुद्दों से भटकाकर अलग-अलग जिलों के लोगों को लड़वा रही है, इस पर कुछ भी कहा नहीं जा सकता है.

Tags:News

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