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छुपाने-झेलने की बात नहीं, स्कूलों में अब बच्चियों की राहत के “वे पांच दिन”

छुपाने-झेलने की बात नहीं,  स्कूलों में अब बच्चियों की राहत के “वे पांच दिन”

टीएनपी डेस्क (TNP DESK) : कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालय, टंडवा में अचानक एक बच्ची के चिल्लाने की आवाज गूंजी. सातवी कक्षा की वह बच्ची दरी पर बैठ कर क्लास कर रही थी, कि अचानक चिल्लाने लगी, हे भगवान, मेरे साथ ये क्या हो गया. कुछ बड़ी बीमारी हो गई है मुझे. अब मैं मर जाउंगी. मैं क्या करूं ! आवाज सुन कर जहां दूसरी बच्चियां भी घबरा गईं, वहीं स्कूल की वार्डेन सोनी कुमारी वहां पहुंची और बच्ची से पूछा, क्या हुआ. बच्ची ने अपनी लाल धब्बे लगी स्कर्ट और दरी पर फैले रक्त को दिखाते हुए कहा कि मैम देखिए, मेरे साथ क्या हो गया. जब वार्डेन ने यह देखा तो पूरा माजरा समझ गईं. वर्तमान में चतरा ब्लॉक में कस्तूरबा विद्यालय की वार्डेन सोनी कुमारी का कुछ साल पहले का यह अनुभव बच्चियों के स्कूल में पीरियड शुरू होने के अनुभव और परेशानियों को दर्शाता है. साल की शुरुआत के साथ कस्तूरबा आवासीय विद्यालयों में बच्चियों की इन्हीं समस्याओं को समझते हुए एक अच्छी पहल शुरू की गई है. शिक्षा विभाग ने कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालयों में में सुरेशन हाइजेनिक मैनेजमेंट लैब की स्थापना की है.

क्या है मेंसुरेशन हाइजेनिक लैब

कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालयों के एक कमरे को मेंसुरेशन हाइजेनिक लैब के रूप में तब्दील किया गया है.  मां-बहनों से दूर रहने वाली बच्चियों को पीरियड से संबंधित हर जानकारी मिले, इसके लिए दीवारों पर सुंदर पेंटिंग बनाई गई है. लैब में पैड बैंक व शॉप बैंक भी बनाया गया है. यहां 24 घंटे पैड व साबुन उपलब्ध रहेगा. इसके अलावा लैब में हॉट बाटर बैग भी हैं ताकि दर्द झेल रही बच्चियों को तत्काल राहत मिल सके. बच्चियों को अक्सर अपनी पीरियड की डेट याद नहीं रहती. मेंस साइकिल से संबंधित जानकारियों का बुकलेट और दीवार पर बनी मोतियों की माला के जरिये उन्हें अपने पीरियड डेट का सही भान हो सकेगा. पीरियड के दौरान हाइजीन से संबंधित जानकारी, इस दौरान पेट व कमर दर्द से संबंधित जानकारी व इसके निवारण से संबंधित किताबें भी यहां उपलब्ध हैं.

छुपाने की नहीं यह बात

कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय की प्रभाग प्रभारी अरूंधति दत्ता ने बताया कि लैब स्थापना का उद्देश्य यही है कि घर परिवार से दूर बच्चियां पीरियड के दौरान परेशान न हों. समझें कि यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जिसे छुपाने या इस दौरान परेशान झेलने की दरकार नहीं. लैब में वह सभी सुविधा उपलब्ध रहेंगी जिनकी पीरियड के दौरान बच्चियों को जरुरत होती है.

अन्य निजी/प्राइवेट स्कूल में हो यह व्यवस्था

वार्डेन सोनी कुमारी कहती हैं कि एक स्कूल में आमतौर पर साढ़े तीन सौ से चार सौ तक बच्चियां पढ़ती हैं. इन बच्चियों के साथ बतौर वार्डेन रहते हुए कई बार पीरियड से जुड़ी उनकी समस्याओं से रु-ब-रु हुईं. किशोर होती बच्चियां अपने शरीर के बदलाव से कई बार परेशान हो जाती हैं. ऐसे में मेंसुरेशन हाइजेनिक लैब स्कूल में होने से कई समस्याओं से निजात मिलेगा. सोनी कुमारी ने आवासीय विद्यालय के साथ अन्य निजी व सरकारी स्कूलों में भी इस तरह के लैब बनाने पर जोर दिया. कहा कि आवासीय विद्यालय में तो फिर भी बच्चियां अपने बेड पर जा सकती, लेकिन अन्य डे स्कूलों में इस तरह की सुविधा की दरकार है.

Published at:24 Jan 2022 02:11 PM (IST)
Tags:News
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