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नेताजी सुभाषचंद्र बोस जयंती : धनबाद के पुटकी बलिहारी के बाद गोमो और फिर गुम, जानिए नेताजी का धनबाद कनेक्शन

BY -
Prakash Tiwary
Prakash Tiwary
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 12, 2026, 6:59:16 PM

धनबाद(DHANBAD): आज पूरा देश नेताजी सुभाषचंद्र बोस जयंती मना रहा है. नेताजी सुभाष चंद्र बोस का धनबाद-झरिया कोयलांचल से बहुत ही गहरा लगाव था. अंतिम बार वह धनबाद के पुटकी बलिहारी में देखे गए थे, यहीं से गोमो गए और गुम हो गए. उसके बाद उनका कोई पता नहीं चला. कई जगहों पर इसके साक्ष्य मिलते है. कोयलांचल में नेताजी अंतिम बार पुटकी बलिहारी में रुके थे, वे पुटकी बलिहारी में अक्सर आया करते था. यह जगह धनबाद मुख्यालय से लगभग 8 किलोमीटर दूर है. इस जगह पर नेताजी के भतीजे अशोक बोस, जो पेशे से एक केमिकल इंजीनियर थे, उनका आवास था. अंग्रेजो ने ही अशोक बोस के आवास को तोड़ दिया था. लेकिन बाद में 1998-99 में बीसीसीएल ने इसका पुनरुद्धार कराया और एक कमरा और कॉटेज बनाया गया. लेकिन इस पर अब किसी का ध्यान नहीं है.

धनबाद के पुटकी बलिहारी में भतीजे के घर आया करते थे

अपने भतीजे के आवास पर वह अक्सर आया करते थे. अंतिम बार नेताजी 16 जनवरी 1941 को पठान के वेश  में बंगाल से भाया बराकर-कुल्टी होते हुए धनबाद पहुंचे थे और 17 जनवरी की रात को यहां से भाया गोमो  पठानकोट के लिए रवाना हुए थे. उनके साथ उनका एक और भतीजा शिशिर बोस और बहू भी थी. उसके बाद उनका कुछ भी पता नहीं चला. जानकारी के अनुसार, 2 जुलाई 1940 को सत्याग्रह के दौरान भारत रक्षा कानून की धारा 129 के तहत नेताजी को प्रेसीडेंसी जेल भेजा गया. गिरफ्तारी से नाराज नेताजी 29 नवंबर से अनशन पर बैठ गए, इससे उनकी तबीयत खराब होने लगी. बाद में उन्हें इस शर्त पर रिहा किया गया कि तबीयत ठीक होने पर फिर से उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा. 

अंग्रेजों की सुरक्षा तोड़ कर पहुंच गए धनबाद

अंग्रेजों ने नेताजी को एलगिन रोड स्थित आवास पर रहने का आदेश दिया और उस जगह पर कड़ा पहरा बैठा दिया गया. मामले की सुनवाई 27 जनवरी 1941 को होनी थी. नेताजी को कठोर सजा मिलने की आशंका थी. इसके बाद वे पहरे को भेद कर 16 जनवरी की रात बंगाल की सरहद पार करने में कामयाब हो गए. वहां से वह पुटकी बलिहारी स्थित अपने भतीजे के घर पहुंचे. उनके साथ भतीजे और बहू भी थे. 

गोमो स्टेशन से पेशावर मेल पकड़ा था

वहां से वह सीधे गोमो स्टेशन पहुंचे और 18 जनवरी को गोमो से पेशावर मेल (अब नेताजी एक्सप्रेस) पकड़ कर निकल गए, उसके बाद वह कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आए और किसी को कुछ पता भी नहीं चला. बता दें कि गोमो स्टेशन का नाम बदलकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नाम पर कर दिया गया है. धनबाद के समाजसेवी निभा दत्ता ने गोमो स्टेशन का नाम बदल कर नेताजी के नाम पर करने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी. गृह मंत्रालय के आदेश पर गोमो स्टेशन का नाम नेताजी सुभाष चंद्र बोस जंक्शन रखा गया. पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव ने 23 जनवरी 2009 में स्टेशन के बदले हुए नाम का अनावरण किया था. बंगला वेलफेयर सोसायटी के गोपाल भट्टाचार्य ने कहा कि बीमारी को देखते हुए इस बार छोटा कार्यक्रम किया गया. उन्होंने आज नेताजी की प्रतिमा लगाने पर प्रधानमंत्री का धन्यवाद् किया. साथ ही मांग की कि नेताजी के बारे में असली बातों को जनता के सामने लाया जाए.    

रिपोर्ट: अभिषेक कुमार सिंह, ब्युरो हेड(धनबाद)

Tags:News

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