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फर्श से अर्श तक का सफर..! जानिए सुमति के संघर्ष की कहानी

BY -
Shreya Gupta
Shreya Gupta
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 17, 2026, 9:01:27 AM

गुमला (GUMLA)  सफलता की कुंजी संसाधन नहीं बल्कि बुलंद हौसले और कुछ कर गुजरने की चाहत होती है. गुमला जैसे आदिवासी बहुल इलाके में अभावों के बीच पलने वाली सुमति उरांव ने भारतीय फुटबाल टीम में शामिल होकर यह साबित कर दिया है. लेकिन दुर्भाग्य है कि इस बेमिसाल उपलब्धि के बाद भी न तो प्रशासन औऱ ना ही सरकार सुमति और उसके परिवार सुधि ले रहे.

दो समय के निवाले की आफत

सुमति उरांव का परिवार गुमला जिला मुख्यालय से 80 किमी दूर भरनो ब्लॉक के लौंडरा गांव में रहता है. सुमति के पिता का कहना है कि शुरू से ही उनके परिवार की माली हालत काफी खराब रही है. दो वक्त का भोजन भ्भी बमुश्किल हासिल होता है. ऐसे परिवार की बेटी ने अंडर 19 में भारतीय फुटबॉल टीम में अपना स्थान बनाया है.  सुमति के पिता खीरू उरांव साधारण कृषक हैं जो खेती बाड़ी कर किसी तरह अपने छह बच्चों का पेट पालते हैं. खीरू उरांव की माने तो आज सोचकर भी आश्चर्य होता है कि उनकी बेटी उस मुकाम पर पहुंची गई है. इसका सपना तक उन्होंने कभी नहीं देखा था. साथ ही उन्होंने बताया कि वे हमेशा एक एक पैसे के मोहताज रहे हैं. ऐसे में वे सुमति जैसी प्रतिभवन बेटी को कैसे अवसर दे पाते. सुमति के पिता ने गुमला के फादर रामू का आभार व्यक्त किया है जो उनकी बेटी के सपना को पूरा करने में सहायक रहे. वहीं सुमति की बड़ी बहन भिखनी कुजूर की माने तो पिता के पास पैसा का इतना अभाव था कि वह सुमति के लिए कपड़ा और जूता तक नहीं खरीद सकते थे.

ये थे सुमति के गॉड फादर

 भारतीय फुटबॉल टीम में शामिल सुमति के घर-परिवार को देखकर लगता है कि सूबे की सरकार के खिलाड़ियों को लेकर किए गए तमाम दावे झूठे हैं. बीते दो वर्षों से सुमति राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी हैं. लेकिन आज भी उसके परिवार को ना तो आवास मिला औऱ ना ही शौचालय की व्यवस्था मिल पाई है. इसको लेकर परिवार काफी परेशान है. वहीं सुमति के लिए गॉड फादर बने फादर रामू का कहना है कि उन्हें सुमति के बारे में जब पता चला तो वे गांव आए और सुमति को अपने साथ शहर ले आए. उसके बाद उसकी हर आवश्यकता को पूरा किया.  सुमति ने भी इसका मान रखा. इंडियन फुटबाल टीम में स्थान बनाया. वहीं उसके कोच के रूप में काफी मेहनत करने वाले फादर कल्याण की माने तो सुमति शुरू से ही काफी मेहनती रही थी. उसने  परिस्थिति की परवाह किए बिना दिन रात मेहनत कर इस सफलता को हासिल की है. आज पूरे राज्य को गर्व है. फादर कल्याण भी खिलाड़ियों को लेकर सरकार के रवैय्ये की निंदा की है.

परिवार को है नाज

सुमति की उपलब्धि पर परिवार को नाज है.  उसकी छोटी बहन की माने तो संसाधन के अभाव के बाद भी वह काफी मेहनत किया करती थी. उसमें फुटबाल को लेकर काफी जुनून था. वहीं उसके भाई तेतरा उरांव की माने तो उन्हें अपनी बहन की मेहनत का काफी भरोसा था. उसकी सफलता ने उनके पूरे परिवार का मान सम्मान बढ़ाया है. तेतरा कहते हैं कि हमारे गांव में अन्य कई खिलाड़ी भी राष्ट्रीय स्तर पर देश का मान बढ़ाने का माद्दा रखते हैं. दरकार है इनकी प्रतिभा को पहचानने और निखारने की.

सरकार की नज़रअंदाजी

केंद्र से लेकर राज्य सरकार लगातार खिलाड़ी को बेहतर सुविधा देने का दावा करती है. लेकिन सुमति की जिंदगी की कहानी जान कर आप समझ सकते हैं कि सरकार के सभी दावें आमतौर पर खोखले ही साबित होते हैं. गरीब घर की बेटी सुमति ने भारतीय फुटबाल टीम में स्थान तो बना लिया. लेकिन उस परिवार को अब सरकार की कितनी मदद मिलती है, ये देखने वाली बात होगी.

रिपोर्ट : सुशील कुमार सिंह, गुमला

Tags:News

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