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सोहराय पर्व : सज कर तैयार गाय-बैल, घर-घर से आ रही पकवानों की खुशबू

सोहराय पर्व : सज कर तैयार गाय-बैल, घर-घर से आ रही पकवानों की खुशबू

दुमका (DUMKA) :  दुमका समेत झारखंड के सभी आदिवासी बहुल इलाके में सोहराय पर्व का उत्साह नजर आने लगा है. घर से लेकर इलाके तक की साफ-सफाई और सजावट के साथ पकवानों की खुशबू माहौल में त्यौहार के रंग घोल रही. सोहराय पर्व को गोधन पूजन पर्व भी माना जाता है. गाय-बैलों को पारंपरिक अंदाज में सजाया जाता है. सोहराय पर्व में गाय-बैल की पूजा आदिवासी समाज काफी उत्साह से करते हैं.

छह दिन का पर्व है सोहराय

मुख्य रूप से यह पर्व छह दिनों तक मनाया जाता है. इसकी धूम पूरे क्षेत्र में देखने को मिलती है. पर्व के पहले दिन गढ़ पूजा पर चावल गुंडी के कई खंड का निर्माण कर पहले खंड में एक अंडा रखा जाता है. गाय-बैलों को एक जगह इकट्‌ठा कर छोड़ दिया जाता है, जो गाय या बैल अंडे को फोड़ता या सुंघता है. उसकी भगवती के नाम पर पहली पूजा की जाती है तथा उन्हें भाग्यवान माना जाता है. इसके बाद मांदर की थाप पर नृत्य होता है. इसी दिन से बैल और गायों के सींग पर प्रतिदिन तेल लगाया जाता है. दूसरे दिन गोहाल पूजा पर मांझी थान में युवकों द्वारा लठ खेल का प्रदर्शन किया जाता है. रात्रि को गोहाल में पशुधन के नाम पर पूजा की जाती है. खानपान के बाद फिर नृत्य गीत का दौर चलता है. तीसरे दिन खुंटैव पूजा पर प्रत्येक घर के द्वार पर बैलों को बांधकर पीठा पकवान का माला पहनाया जाता है और ढोल-ढाक बजाते हुए पीठा को छीनने का खेल होता है. चौथे दिन जाली पूजा पर घर-घर से चंदा उठाकर प्रधान को दिया जाता है और सोहराय गीतो पर नृत्य-गीत चलता है. पांचवा दिन हांकु काटकम कहलाता है. इस दिन आदिवासी लोग मछली और केकड़े पकड़ते हैं. छठे दिन आदिवासी झुंड में शिकार के लिए निकलते हैं. शिकार में प्राप्त खरगोश, तीतर आदि जन्तुओं को मांझीथान में इकठ्ठा कर घर-घर प्रसाद के रुप में बांटा जाता है. संक्रांति के दिन को बेझा तुय कहा जाता है. इस दिन गांव के बाहर नायकी अर्थात पुजारी सहित अन्य लोग ऐराडम पेंड़ को गाड़कर तीर चलाते हैं.

सोहराय पर्व की कथा

आदिवासियों में सोहराय पर्व की उत्पत्ति की कथा भी काफी रोचक है. इस बारे में फतेहपुर के पूर्व प्रमुख अरविन्द मुर्मू, धर्मगुरु नकुल सोरेन, विभिषण हेम्ब्रम, शिवधन मुर्मू, नलीन सोरेन आदि ने बताया कि जब मंचपुरी अर्थात मृत्युलोक में मानवों की उत्पत्ति होने लगी तो बच्चों के लिए दूध की जरूरत महसूस हुई. उस कालखंड में पशुओं का सृजन स्वर्गलोक में होता था. मानव जाति की इस मांग पर मारांगबुरु अर्थात शिवजी स्वर्ग पहुंचे और अयनी गाय, बयनी गाय, सुगी गाय, सांवली गाय, करी गाय, कपिल गाय और वरदा बैल से मृत्युलोक में चलने की अपील की. लेकिन ये नहीं मानें. तो शिवजी ने कहा कि मंचपुरी में मानव युगो-युगो तक तुम्हारी पूजा करेगा. तब वे लोग राजी होकर धरती पर आएं. उसी गाय-बैल की पूजा के साथ सोहराय पर्व की शुरुआत हुई.

रिपोर्ट: सुतिब्रो गोस्वामी, जरमुंडी(दुमका)   

Published at:07 Jan 2022 03:36 PM (IST)
Tags:News
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