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रातों-रात खाकपति से करोड़पति बन गया था यह शख्स, पढ़िए क्या है मामला

BY -
Shreya Gupta
Shreya Gupta
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 12, 2026, 4:19:48 AM

दुमका (DUMKA) - दुमका में ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल द्वारा एक करोड़ 42 लाख 20 हजार 590 रुपए सरकारी राशि के गबन की प्राथमिकी 8 नवंबर को नगर थाना में दर्ज कराई गई थी. इस मामले को द न्यूज़ पोस्ट ने प्रमुखता से दिखाया था. नगर थाना के पुलिस ने 24 नवंबर को ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल के वरीय लेखा लिपिक पंकज वर्मा और कंप्यूटर ऑपरेटर पवन गुप्ता को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. एक बार फिर से आपको बताते हैं क्या है पूरा मामला.

कैंसिल चेक कर दिया गया अपलोड

दरअसल दुमका जिला के रामगढ़ प्रखंड के लखीमपुर में एबीसी कंस्ट्रक्शन द्वारा 10 करोड़ रुपए की लागत से पुल का निर्माण कराया जा रहा है. कार्य के एवज में विभाग द्वारा 28 अक्टूबर को हार्ड कॉपी और एक करोड़ 42 लाख 20 हजार 590 रुपए का चेक एबीसी कंस्ट्रक्शन के एसबीआई खाता में भुगतान के लिए कोषागार पदाधिकारी के पास भेजा गया. लेकिन कोषागार पदाधिकारी के पास हार्ड कॉपी और चेक भेजे जाने के बाद सॉफ्ट कॉपी में छेड़छाड़ कर एबीसी कंस्ट्रक्शन की एसबीआई अकाउंट के बदले हरियाणा हिसार की जीके इंटरप्राइजेज नामक कंपनी के केनरा बैंक का अकाउंट नंबर सेट कर दिया गया. इतना ही नहीं जी के इंटरप्राइजेज का कैंसिल चेक भी अपलोड कर दिया गया. राशि जब एबीसी कंस्ट्रक्शन के खाते में नहीं पहुंची तो 8 नवंबर को संवेदक द्वारा इसकी लिखित शिकायत ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल से की गई जिसके आधार पर नगर थाना में जीके इंटरप्राइजेज पर प्राथमिकी दर्ज की गई.

रातों रात खाताधारक बना करोड़पति

बता दें कि कि सरकारी व्यवस्था में कहां खामी थी जिसके कारण जी के इंटरप्राइजेज नामक कंपनी के खाताधारक राजेश कुमार सिंह रातों रात करोड़पति बन गया. सूत्रों की मानें तो 28 अक्टूबर तक उसके खाते में मात्र ₹31 था लेकिन 29 अक्टूबर को एक करोड़ 42 लाख से ज्यादा रुपए हो गए और वह इतना शातिर निकला कि तमाम राशि का ट्रांजैक्शन कई अकाउंट में कर दिया. राजेश कुमार सिंह बिहार के नवादा का रहने वाला है और उसने अपने छोटे भाई रंजन सिंह के खाता में ₹5400000 भेजा था. फिलहाल पुलिस नवादा से रंजन को दुमका लाकर पूछताछ कर रही है जबकि राजेश सिंह की गिरफ्तारी के लिए पुलिस की टीम दिल्ली में कैंप कर रही है. फिलहाल वह फरार है.

सही डाटा के बाद ही राशि का ट्रांजैक्शन मुमकिन

इस पूरे प्रकरण में एक सवाल जो आम आदमी के जेहन में उठ रहा है कि क्या कोषागार पदाधिकारी द्वारा इस गबन को रोका जा सकता था या नहीं? क्योंकि कैमरा के सामने ना सही दबी जुबान से ही विशेष प्रमंडल के पदाधिकारी यह कहते हैं कि चेक और हार्ड कॉपी कोषागार भेजने के बाद जिम्मेदारी कोषागार पदाधिकारी की बनती है कि वह हार्ड कॉपी और सॉफ्ट कॉपी का मिलान कर राशि का स्थानांतरण करें. इस मामले में जिला कोषागार पदाधिकारी विकास कुमार ने स्पष्ट कहा कि जिस राशि का निकासी और व्ययन पदाधिकारी (डीडीओ) कोषागार पदाधिकारी होते हैं. उसी का अकाउंट डिटेल सॉफ्ट कॉपी में दिखता है. इस मामले में डीडीओ ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल के कार्यपालक अभियंता है, इसलिए सॉफ्ट कॉपी में अकाउंट डिटेल ट्रेजरी अफसर नहीं देख सकता. ऐसे मामले में कोषागार पदाधिकारी को सॉफ्ट कॉपी में एडवाइस नंबर, एंट्री डेट, ऑपरेटर नेम, ड्रावर नेम, नेट अमाउंट, ग्रॉस अमाउंट, विल हेड, पेमेंट मोड ही शो करता है और इन तमाम डाटा का मिलान सही पाए जाने पर ही उन्होंने राशि का ट्रांजैक्शन किया है.

रिपोर्ट : पंचम कुमार झा, दुमका

Tags:News

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