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सीखना चाहते हैं छऊ नृत्य तो पहुंचे सरायकेला गुरुकुल

BY -
Vikas Kumar  Saraikela
Vikas Kumar Saraikela
Copy Editor • TheNewsPost.in
PublishedAt: January 18, 2026, 4:44:11 PM

 सरायकेला (SARAIKELA) : सरायकेला राज परिवार से जन्मी छऊ कला किसी परिचय की मोहताज नहीं है. मुखौटा से चेहरा छुपाकर भाव प्रदर्शित करने की यह अद्भुत कला आज विश्व स्तर पर अपनी एक खास पहचान बना रखी है. वर्ष 2019 तक छह छऊ गुरुओं को इस कला में पद्मश्री मिल चुका था. सरायकेला राजघराने के राजकुमार सुधेंद्र नारायण सिंह देव  को पहली बार छऊ कला में पद्मश्री मिला था, फिर उसके बाद केदारनाथ साहू, श्यामाचरण पति, मंगलाचरण पति, मकरध्वज दारोघा तथा पंडित गोपाल दुबे को यह पुरस्कार मिल चुका है. वर्ष 2020 के लिए छऊ कला में 7 वें पद्मश्री के रूप में शशधर आचार्या को पुरस्कृत किया गया है. पुरस्कार मिलने के साथ ही सरायकेला में छऊ कला प्रेमियों के बीच खुशी की लहर देखी जा रही है. राष्ट्रपति भवन में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा यह पुरस्कार उन्हें दिया गया. पिछली पांच पीढ़ी से सरायकेला छऊ में समर्पित शशधर के परिवार में पहली बार किसी को पद्मश्री मिलने सभी काफी खुश हैं. पेश है सरायकेला से विकास कुमार की खास रिपोर्ट...

पांच पीढ़ियों के समर्पण को मिला सम्मान

शशधर आचार्य ने 5 वर्ष की आयु से ही अपने पिता गुरु लिंगराज आचार्य के सानिध्य में इस कला का ककहरा सीखा. फिर अपनी मेहनत के बल पर साल दर साल छऊ कला में ये पारंगत होते गए. आज वे सरायकेला व दिल्ली में आचार्य छऊ नृत्य विचित्रा नामक संस्था चलाकर नई पीढ़ियों को छऊ नृत्य का ज्ञान देते हैं. ये दिल्ली के नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) तथा पुणे के फिल्म एंड टेलिविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया संस्थान में शिक्षक के रूप में अपना योगदान देते हैं. छऊ कला में बेहतर प्रदर्शन के कारण ही इन्हें ढेरों पुरस्कार मिल चुके हैं और आज इनकी उपलब्धियों में एक स्वर्णिम उपलब्धि और भी जुड़ गई है. शशधर आचार्य 1990 से 1994 तक राजकीय नृत्य कला केंद्र निदेशक भी रहे थे. हालांकि स्टडी लीव के कारण इन्होंने निदेशक का पद छोड़ दिया और वापस फिर कभी योगदान नहीं किया. आज शशधर आचार्य अपनी इस उपलब्धि से काफी खुश हैं तथा अपने गुरु समान पिता तथा अन्य गुरु को यह सम्मान समर्पित कर रहे हैं. एक बार फिर सरायकेला के छऊ गुरु को पद्मश्री मिलने से परिवार समेत पूरा सरायकेला काफी खुश है. पांच पीढ़ियों से छऊ कला की सेवा कर रहा है यह परिवार आज फुले नहीं समा रहा है. उनके परिवार वालों का कहना है कि आज उनके पिता की आत्मा को शांति मिलेगी.  उधर राजकीय छऊ नृत्य कला केंद्र के निदेशक तपन पटनायक ने भी छऊ कला के उत्थान की दिशा में तथा कला के प्रति नए उत्साह के सृजन हेतु इस पुरस्कार को काफी अहम माना है.

कला बहुत कुछ देती है, पर मांगती है सिर्फ समर्पण   

पद्मश्री छऊ गुरु शशधर आचार्या ने कहा कि बदलते वक्त के साथ छऊ कला तथा छऊ कलाकारों के उत्थान हेतु बेहतर शिक्षा और बेहतर रोजगार सोच के साथ आगे बढ़ना होगा, तभी सभी कलाकारों तथा छऊ कला का वास्तविक उत्थान हो सकेगा. उन्होंने आम कलाकारों व नवोदित कलाकारों आह्वान करते हुए कहा कि वे छऊ कला को सरायकेला में सीखे, मगर रोजगार पा कर आर्थिक समृद्धि हेतु बाहर जाएं. तभी छऊ कला व छऊ कलाकारों का भला होगा. आज देश-विदेश में घूम रहा हूं, सम्मान मिल रहा है, तो इस कला की बदौलत ही. कला बहुत कुछ देती है, पर बस एक चीज की मांग करती है. वह है समपर्ण, कमिटमेंट.

 बहरहाल,  एक छोटे से शहर से केवल एक कला के लिए सात पद्मश्री मिलना वाकई में एक बड़ी उपलब्धि है. हर साल गुजरने के साथ न सिर्फ छऊ कला का उत्थान हो रहा है, बल्कि इसकी उपलब्धियों में भी चार चांद लगता जा रहा है. ऐसे में यह उम्मीद की जानी चाहिए कि छऊ गुरुओं की बढ़ रही विरासत के बीच यह कला ना सिर्फ संरक्षित होगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी इस कला के प्रति प्रोत्साहित करने में अहम योगदान करेगा.

Tags:News

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